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हर ब्रेकअप को रेप मत बताओ”, सुप्रीम कोर्ट ने रिश्तो और अपराध में बताया अंतर….

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया कि हर टूटे रिश्ते को ‘रेप का मामला’ बताकर आपराधिक प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि बलात्कार का आरोप तभी लगाया जाना चाहिए जब वास्तव में जबरदस्ती, हिंसा या बिना इच्छा के यौन संबंध का स्पष्ट सबूत हो।

पीठ ने एक पुराने केस में दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा सहमति वाले संबंधों के खत्म हो जाने को अपराध का रूप नहीं दिया जा सकता। कानून और कलंक दोनों का फर्क समझना जरूरी है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

कोर्ट ने पाया कि मामले में दोनों पक्ष कई सालों तक सहमति से रिश्ते में थे संबंध टूटने के बाद शिकायत दर्ज की गई, जिसमें शादी का वादा टूटने का आरोप था। अदालत ने कहा कि शादी न होने की वजह से नाराज़गी, दुख या ब्रेकअप अपने आप में रेप नहीं बन जाता आरोप तभी लागू होंगे जब यह साबित हो कि शुरू से ही शादी का झूठा वादा केवल यौन संबंध बनाने के लिए किया गया था। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा रेप सबसे गंभीर अपराध है, इसे भावनात्मक विवाद या निजी टकराव का औज़ार नहीं बनाया जा सकता

दुरुपयोग पर चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि झूठे या अतिरंजित आरोपों से असली पीड़ितों के मामलों की गंभीरता कम होती है। बिना वजह रेप की एफआईआर दर्ज होने से आरोपी पर जीवन भर का कलंक लग सकता है। पुलिस और अदालतों को ऐसे संवेदनशील मामलों में तथ्यों की गहराई से जांच करनी होगी।

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