खुर्शीद अहमद सिद्दीकी (ग़ुलाम मुस्तफ़ा)
दुनिया के इतिहास में युद्ध और संघर्ष हमेशा से होते आए हैं। आम तौर पर जब कोई राष्ट्र जीतता है तो वह पराजित राष्ट्र को पूरी तरह कुचल देता है। इतिहास की यह एक कड़वी सच्चाई रही है। लेकिन इसके विपरीत रहमतुल्लिल आलमीन Muhammad ﷺ और उनके सहाबा का अपने दुश्मनों के साथ व्यवहार मानव इतिहास का एक सुनहरा और अनोखा अध्याय है।
20 रमज़ान, 8 हिजरी को होने वाली ऐतिहासिक घटना फ़तह-ए-मक्का इसकी सबसे उज्ज्वल मिसाल है। उस दिन बिना किसी बड़े रक्तपात के Mecca की विजय हुई और नबी ﷺ ने ऐलान कर दिया कि “आज सबके लिए आम माफी है।” खून की एक बूंद बहाए बिना मक्का की धरती से मूर्ति-पूजा का अंत हुआ और इस्लाम का संदेश पूरे क्षेत्र में फैल गया।
यह महान चरित्र था मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ का। अल्लाह तआला ने Quran की Surah Al-Fath में इस स्पष्ट विजय की खुशखबरी पहले ही दे दी थी, जिसकी भूमिका Treaty of Hudaybiyyah के माध्यम से तैयार हो चुकी थी।
फ़तह-ए-मक्का वास्तव में सब्र, हिकमत और क्षमा का महान पाठ है। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि इस्लाम तलवार के बल पर नहीं बल्कि उच्च नैतिकता, न्याय और दयालुता के जरिए दिलों को जीतने का संदेश देता है। रसूल-ए-अकरम ﷺ ने अपने सबसे बड़े दुश्मनों को भी माफ़ करके पूरी मानवता को यह पैग़ाम दिया कि असली विजय दुश्मन को खत्म करना नहीं बल्कि उसके दिल को जीत लेना है।
यही वजह है कि फ़तह-ए-मक्का के बाद लोग बड़ी संख्या में इस्लाम में दाखिल होने लगे और अरब प्रायद्वीप में सत्य और न्याय का परचम बुलंद हो गया।
फ़तह-ए-मक्का पूरी मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है, लेकिन खास तौर पर मुसलमानों के लिए यह मार्गदर्शन देता है कि अल्लाह की आज्ञा का पालन ही असली सफलता है। इसके लिए बड़ी सेना नहीं बल्कि अल्लाह की मदद और भरोसे की जरूरत होती है। Battle of Badr में कम साधनों के बावजूद मिली जीत, फ़तह-ए-मक्का और Umar ibn al-Khattab के दौर में Jerusalem का बिना रक्तपात के समर्पण — ये सभी घटनाएँ अल्लाह की मदद की स्पष्ट मिसाल हैं।
उम्मत-ए-मुस्लिमह को चाहिए कि इन घटनाओं से सबक लेकर हर दौर में अल्लाह के दीन को कायम रखने के लिए प्रयास करती रहे और अल्लाह से मदद की दुआ करते हुए उसी पर भरोसा बनाए रखे।
फ़तह-ए-मक्का: दरस-ए-मोहम्मदी और इंसानियत का पैग़ाम….






