Home / Article / हिंदू धर्म छोड़ मुस्लिम बनी दो युवतियों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश कहा अवैध कैद से तत्काल करें….

हिंदू धर्म छोड़ मुस्लिम बनी दो युवतियों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश कहा अवैध कैद से तत्काल करें….

स्वेच्छा से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने और अपनी पसंद से शादी करने का फैसला करने वाली दो बालिग बहनों के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने उत्तर प्रदेश शासन, स्थानीय पुलिस अधिकारियों और युवतियों के पिता को सख्त निर्देश देते हुए दोनों महिलाओं को 6 अगस्त 2026 को हर हाल में अदालत के समक्ष पेश करने का आदेश दिया है।

क्या है पूरा मामला?
मामला उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से जुड़ा है। 20 वर्षीया दिव्या भाटिया (परिवर्तित नाम ज़ोया दिया भाटिया) और 35 वर्षीया अंशू भाटिया (परिवर्तित नाम आमिना अंशू भाटिया) की ओर से हाईकोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की गई।
याचिका में दावा किया गया है कि:
दोनों बहनें बालिग और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।
उन्होंने बिना किसी दबाव, प्रलोभन या जबरदस्ती के अपनी स्वतंत्र इच्छा से हिंदू धर्म त्यागकर इस्लाम स्वीकार किया है।
दोनों ने अपनी पसंद के व्यक्तियों से विवाह (निकाह) करने का स्वतंत्र निर्णय लिया है।

पिता और पुलिस पर अवैध हिरासत का आरोप
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता अली बिन सैफ और कैफ हसन ने अदालत को बताया कि युवतियों के इस फैसले से नाराज उनके पिता ने आगरा के सदर बाजार थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 (अपहरण/शादी के लिए मजबूर करना) के तहत झूठी FIR दर्ज कराई।
आरोप है कि पिता ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर दोनों बहनों को उनके घर में अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा हुआ है, ताकि वे अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग न कर सकें।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
मामले की प्राथमिक सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और अपने जीवन, धर्म, निवास और विवाह से जुड़े निर्णय लेने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा:
यदि याचिका में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो किसी भी नागरिक की धर्म, विवाह और निवास से जुड़ी व्यक्तिगत पसंद में किसी भी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप संविधान द्वारा प्रदत्त उसकी गरिमा (Dignity), निजता (Privacy) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।”

6 अगस्त को जवाबदेही तय
हाईकोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में अदालत का प्राथमिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से कार्य कर रहे हैं या उन्हें किसी गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया है।
इसीलिए कोर्ट ने 6 अगस्त को दोनों महिलाओं को उपस्थित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि उस दिन महिलाओं को पेश नहीं किया गया, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) दाखिल कर अनुपालन न होने का ठोस कारण बताना होगा।

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