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शोध में दावा…नींद व इससे संबंधित समस्या बन रही उत्तराखंड में सड़क हादसों का बड़ा कारण…..

उत्तराखंड की सड़कों पर रोज़ाना सफर करते आम लोग — स्कूटर चलाते युवा, ऑटो में मेहनत करते ड्राइवर, या ट्रक लेकर लंबी दूरी तय करने वाले चालक — ये सभी एक आम लेकिन खतरनाक दुश्मन से जूझ रहे हैं: नींद और उससे जुड़ी बीमारियां।एम्स ऋषिकेश के मनोरोग विभाग ने एक सालभर चले शोध में ऐसा सच उजागर किया है, जो अब तक छुपा हुआ था। 1200 से अधिक सड़क हादसों के शिकार लोगों पर किए गए इस अध्ययन में सामने आया कि बड़ी संख्या में दुर्घटनाओं के पीछे नींद आना, थकावट और नींद से जुड़ी समस्याएं थीं — न कि सिर्फ नशा।सोचिए, जब एक थका हारा ड्राइवर जो पूरी रात जगा है, दिनभर गाड़ी चलाने के बाद दोपहर में झपकता है — और वही झपकी किसी का घर उजाड़ सकती है।
शोध में सामने आया कि:

  • 21% हादसे नींद आने की वजह से हुए।
  • 26% मामलों में थकान और अत्यधिक काम की वजह से चालक को झपकी आई।
  • और हैरानी की बात ये रही कि नशे के साथ-साथ नींद की समस्या भी बड़ी भूमिका निभा रही थी।

शोध के निदेशक प्रो. रवि गुप्ता और डॉ. विशाल धीमान कहते हैं कि कई बार चालक को पता होता है कि वो थका हुआ है, फिर भी वे गाड़ी चलाते रहते हैं — शायद काम का दबाव, या पहुंचने की जल्दी। लेकिन यही लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।शोध में ये भी सामने आया कि ज्यादातर हादसे शाम 6 से रात 12 बजे के बीच, यानी उस समय होते हैं जब लोग थक चुके होते हैं — और कुछ ने शायद शराब भी पी रखी होती है, जो नींद की समस्या को और बढ़ा देती है।

तो क्या किया जा सकता है?

  • प्रो. गुप्ता का सुझाव है कि ड्राइविंग लाइसेंस के लिए सिर्फ आंख और ब्लड प्रेशर की जांच काफी नहीं, नींद से जुड़ी बीमारी की जांच भी होनी चाहिए।
  • वाहनों में ऐसा सेंसर होना चाहिए जो ड्राइवर को नींद की स्थिति में अलर्ट करे।
  • और सबसे जरूरी बात — ड्राइवरों को यह सिखाया जाए कि जब आंखें भारी हों, तो रुक जाना बहादुरी है, कमजोरी नहीं।

ये रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं बताती, ये उन हादसों की कहानी है जो शायद एक झपकी के कारण हुए। और अगर हम समय रहते चेते, तो कई ज़िंदगियाँ बच सकती थीं।

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