लखनऊ
उत्तर प्रदेश में इस साल अप्रैल–मई के बीच प्रस्तावित त्रि-स्तरीय पंचायत चुनावों पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। चुनाव टलने की सबसे बड़ी वजह अभी तक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (Dedicated OBC Commission) का गठन न होना बताया जा रहा है। आयोग के बिना पंचायतों में ओबीसी आरक्षण तय करना संभव नहीं है, जिससे पूरी आरक्षण प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।
आरक्षण के बिना चुनाव संभव नहीं
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पंचायत चुनावों में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने से पहले राज्य सरकार को समर्पित आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला पूरा करना होता है। इसमें—
पिछड़े वर्गों की पहचान,
उनके राजनीतिक पिछड़ेपन का आकलन,
और आरक्षण की सीमा तय करना शामिल है।
जब तक आयोग गठित होकर अपनी रिपोर्ट नहीं देता, तब तक पंचायतों में सीटों का आरक्षण तय नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक तैयारियां भी प्रभावित
आरक्षण तय न होने के कारण जिला प्रशासन स्तर पर चुनावी तैयारियां भी ठप पड़ी हैं। वार्डों और ग्राम पंचायतों का परिसीमन, आरक्षित सीटों की अधिसूचना और चुनाव कार्यक्रम जारी करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
सरकार पर बढ़ा दबाव
विपक्षी दल इस मुद्दे पर सरकार को घेरने लगे हैं। उनका कहना है कि समय रहते आयोग का गठन न करना सरकार की प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष का तर्क है कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए ही आगे बढ़ा जाएगा और जल्द समाधान निकाला जाएगा।
चुनाव टलने की प्रबल संभावना
राजनीतिक और प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो यदि जल्द ही समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर रिपोर्ट नहीं ली गई, तो अप्रैल–मई में पंचायत चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा। ऐसी स्थिति में चुनावों को कुछ मह
पंचायत चुनाव पर संकट: यूपी में अप्रैल–मई में प्रस्तावित चुनाव टलने के आसार






