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फटा तिरंगा फहराकर देश के सम्मान से खिलवाड़? काशीपानी स्कूल में लापरवाही की हद, शिक्षक से लेकर अफसरों तक पर सवाल

करतला/कोरबा। देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, तिरंगा देश की आन-बान-शान का प्रतीक बनकर आसमान में लहरा रहा था, लेकिन करतला विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला काशीपानी में राष्ट्रीय पर्व की गरिमा ही तार-तार होती नजर आई। आरोप है कि विद्यालय में पुराना और फटा हुआ तिरंगा फहरा दिया गया। अब सवाल यह है कि आखिर इस लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा?

यह सिर्फ एक झंडे के पुराने होने का मामला नहीं है। सवाल उस पूरी सरकारी व्यवस्था पर है, जहां बच्चों को राष्ट्रध्वज का सम्मान सिखाया जाता है, लेकिन उसी विद्यालय में राष्ट्रीय पर्व के दिन क्षतिग्रस्त तिरंगा फहराने की नौबत आ जाती है।

ध्वजारोहण से पहले क्या जिम्मेदारों की आंखें बंद थीं?

स्वतंत्रता दिवस अचानक आने वाला पर्व नहीं है। इसकी तैयारियां पहले से होती हैं। फिर विद्यालय के शिक्षक और जिम्मेदारों ने ध्वजारोहण से पहले तिरंगे की स्थिति क्यों नहीं देखी?

क्या स्कूल में एक भी व्यक्ति ने यह देखना जरूरी नहीं समझा कि तिरंगा फटा हुआ है?

अगर पता था, तो नया तिरंगा क्यों नहीं खरीदा गया?
अगर पता नहीं था, तो विद्यालय की निगरानी व्यवस्था आखिर किस काम की है?

₹12 हजार की राशि और फिर भी व्यवस्था बदहाल!

विद्यालय में लिपाई-पुताई एवं आवश्यक सामग्री के लिए शासन से करीब ₹12,000 की राशि स्वीकृत होने की जानकारी सामने आई है। एक किस्त जारी होने की बात भी बताई जा रही है।

तो फिर सवाल और भी तीखा है—जब स्कूल के लिए सरकारी पैसा आ रहा है, तब राष्ट्रीय पर्व पर एक सम्मानजनक तिरंगा तक क्यों उपलब्ध नहीं था?

अब ग्रामीणों की मांग है कि राशि की पाई-पाई का हिसाब सामने आए। पैसा कब मिला? कितना खर्च हुआ? किस सामग्री की खरीदी हुई? बिल-वाउचर कहां हैं? स्टॉक में क्या दर्ज है?

यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में परेशानी कैसी?

शिक्षक की जिम्मेदारी पर सीधा सवाल

विद्यालय की रोजमर्रा की व्यवस्था से लेकर राष्ट्रीय पर्व की तैयारियों तक संबंधित शिक्षक की भूमिका अहम होती है। ऐसे में फटा हुआ तिरंगा फहराए जाने के मामले में जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना आसान नहीं होगा।

ग्रामीणों का सवाल साफ है—
जब शिक्षक बच्चों को देशभक्ति और राष्ट्रध्वज का सम्मान पढ़ाते हैं, तो फिर उसी स्कूल में फटे तिरंगे की नौबत कैसे आई?

संकुल प्रभारी भी बोले—गलत हुआ

मामले में संकुल प्रभारी ने भी माना है कि पुराने और फटे हुए राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल गलत है और लापरवाही करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

जब विभागीय जिम्मेदार खुद इसे गलत मान रहे हैं, तो अब अगला सवाल है—कार्रवाई होगी कब और किस पर?

जनप्रतिनिधि भी सवालों से बाहर नहीं

विद्यालय केवल शिक्षक की जिम्मेदारी नहीं है। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग से जुड़े जिम्मेदारों की भी निगरानी और जवाबदेही बनती है।

यदि स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान जनप्रतिनिधि या अन्य जिम्मेदार मौजूद थे, तो फटा तिरंगा किसी को नजर क्यों नहीं आया?

क्या राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा से ज्यादा जरूरी सिर्फ कार्यक्रम की औपचारिकता थी?

संकुल से लेकर BEO कार्यालय तक जवाबदेही तय हो

अब मामला सिर्फ काशीपानी स्कूल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। संकुल प्रभारी और विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) को भी पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।

जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि—

  • फटा तिरंगा विद्यालय तक पहुंचा कैसे?
  • ध्वजारोहण से पहले उसकी जांच किसने की?
  • नया तिरंगा क्यों नहीं खरीदा गया?
  • विद्यालय को मिली राशि का उपयोग कहां हुआ?
  • राशि खर्च करने की अनुमति और रिकॉर्ड क्या है?
  • जिम्मेदार शिक्षक ने समय रहते अधिकारियों को सूचना क्यों नहीं दी?
  • संकुल स्तर पर निरीक्षण और मॉनिटरिंग क्यों नहीं हुई?

अब देखना है—जांच होगी या जिम्मेदारों को बचाया जाएगा?

राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान किसी सरकारी फाइल का विषय नहीं, बल्कि देश की अस्मिता से जुड़ा सवाल है। स्कूल में फटा तिरंगा फहराने की शिकायत सामने आने के बाद अब शिक्षा विभाग की अग्निपरीक्षा है।

क्या विभाग जिम्मेदारी तय करेगा?
क्या लापरवाही करने वाले शिक्षक पर कार्रवाई होगी?
क्या संकुल स्तर की मॉनिटरिंग की जांच होगी?
क्या BEO पूरे मामले की जवाबदेही तय करेंगे?
और क्या सरकारी राशि के उपयोग का हिसाब सार्वजनिक किया जाएगा?

काशीपानी का मामला अब सिर्फ “फटा तिरंगा” नहीं रह गया है। यह सरकारी स्कूलों की व्यवस्था, निगरानी और जिम्मेदारों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन चुका है।

देश की आन-बान-शान तिरंगे को सम्मान देना अगर स्कूल प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं है, तो आखिर प्राथमिकता क्या है?

अब जरूरत बयानबाजी की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की है।
अशोक कुमार श्रीवास की खास रिपोर्ट तुमान से

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