मानवीय स्पर्श के साथ दो पैराग्राफ में सारांश:गोरखपुर के कैंपियरगंज इलाके में दिल को झकझोर देने वाली घटना हुई, जहां एक बेटे ने अपनी ही मां के शव को लेने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया, क्योंकि घर में शादी थी और उसे “अपशकुन” लगने का डर था। बूढ़े पिता, जो पत्नी की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए जौनपुर के वृद्धाश्रम से लाश लेकर आए थे, यह सुनकर वहीं फूट-फूटकर रो पड़े। हालात इतने शर्मनाक हो गए कि रिश्तेदारों ने अपनी समझ से महिला को घाट किनारे दफना दिया, जिससे बुजुर्ग पिता का दर्द और बढ़ गया। उनका कहना था कि पत्नी का अंतिम संस्कार भी ठीक से नहीं होने दिया गया और उसे मिट्टी में छोड़ दिया गया, जहां कीड़े लग जाएंगे—यह सोचकर वह टूटते जा रहे हैं।भुआल गुप्ता का परिवार कभी खुशहाल था, लेकिन एक साल पहले बड़ा बेटा संजय उन्हें “बोझ” कहकर घर से निकाल चुका था। अपमान और निराशा में डूबकर दंपती ने आत्महत्या तक करने की कोशिश की, मगर एक अजनबी ने उन्हें बचाकर रहने का सहारा दिलाने की बात कही। अयोध्या और मथुरा में भटकते हुए आखिरकार उन्हें जौनपुर के वृद्धाश्रम का सहारा मिला, जहां रवि कुमार चौबे ने उन्हें शरण दी। वहीं उन्होंने रोते हुए बताया था कि कैसे अपने ही बच्चों ने उन्हें पराया बना दिया—और अब पत्नी के अंतिम सफर में भी उन्हें अकेला छोड़ दिया।






