उत्तराखंड की राजनीति में मंगलवार को ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो अब तक कभी नहीं हुआ था। विधानसभा के इतिहास में पहली बार विपक्षी विधायक पूरी रात सदन के अंदर ही धरने पर बैठे रहे। न विधानसभा अध्यक्ष की अपील काम आई, न मुख्यमंत्री धामी की गुजारिश, न ही सत्ता पक्ष का समझाना।
दरअसल, गैरसैंण के भराड़ीसैंण विधानसभा भवन में मॉनसून सत्र शुरू होते ही कांग्रेस विधायकों ने नैनीताल जिला पंचायत चुनाव में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के साथ हुई धक्का-मुक्की और कानून-व्यवस्था का मुद्दा उठाना चाहा। लेकिन सरकार ने सत्र को तय एजेंडे के हिसाब से चलाना शुरू किया। इसी से कांग्रेस भड़क गई। नतीजा सदन में हंगामा, माइक उखाड़े गए, टेबल पलटे गए और कार्यवाही बार-बार ठप होती रही।
जब हालात संभलना मुश्किल हुआ तो विधानसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दी। सत्ता पक्ष तो बाहर चला गया, मगर कांग्रेस विधायक सदन में ही अड़ गए। उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया। शाम को सरकार और विपक्ष के बीच करीब 40 मिनट बातचीत हुई, लेकिन कोई हल नहीं निकला। कांग्रेस तीन मांगों पर अड़ी रही नैनीताल के डीएम का ट्रांसफर, एसएसपी का सस्पेंशन और दर्ज मुकदमों की वापसी।
मुख्यमंत्री धामी ने हालात संभालने की कोशिश की। कई अधिकारियों के तबादले किए, जांच के आदेश दिए और खुद फोन करके विपक्षी नेताओं से धरना खत्म करने की अपील की। मगर असर नहीं हुआ। इतिहास में पहली बार, विधायक रजाई-कंबल मंगवाकर सदन में ही रात गुजारने लगे। यह नज़ारा लोगों को उत्तराखंड आंदोलन की याद दिला गया। अब सवाल यही है कि बुधवार को सरकार विपक्ष की मांगें मानती है या फिर एक और दिन सदन का कामकाज हंगामे की भेंट चढ़ जाता है।






