सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद जरूरी और आज के दौर से जुड़ी बात कही। अदालत ने साफ कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है, लेकिन इसके साथ-साथ हमें खुद पर नियंत्रण भी रखना होगा।कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया आज सिर्फ विचारों का मंच नहीं रह गया, यहां नफरत फैलाने वाली बातें भी तेजी से वायरल होती हैं। ऐसे में हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वो सोच-समझकर बोले और कोई ऐसी बात न कहे जिससे समाज में तनाव फैले।सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि वो सेंसरशिप लागू करने के पक्ष में नहीं है। बल्कि चाहती है कि लोग खुद जागरूक बनें, अपनी आज़ादी का इस्तेमाल सोच-समझकर करें।
ये टिप्पणी कोर्ट ने उस केस की सुनवाई के दौरान दी, जिसमें वजाहत खान नाम के शख्स ने सोशल मीडिया पर किए गए पुराने ट्वीट्स को लेकर कई राज्यों में दर्ज एफआईआर से राहत मांगी थी। कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक 14 जुलाई से आगे बढ़ा दी है।वजाहत खान का कहना है कि उन्होंने पहले खुद सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली पोस्ट के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, लेकिन बदले में उन्हीं के खिलाफ केस दर्ज कर दिए गए। कोर्ट ने इस पूरे मसले को बहुत गंभीरता से लिया और पूछा कि क्या ऐसा कोई रास्ता हो सकता है जिससे सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और सामाजिक सौहार्द – दोनों के बीच संतुलन बना रहे।अदालत ने वकीलों से भी मदद मांगी है कि इस मुद्दे पर क्या समाधान निकाला जा सकता है।






