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संवैधानिक भावना और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध है N S बिंद्रा का बयान…..

लेखक: खुर्शीद अहमद सिद्दीकी (ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा)
देहरादून

कल अल्पसंख्यक स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में उत्तराखंड अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष श्री नरेंद्र जीत बिंद्रा द्वारा दिया गया वक्तव्य अत्यंत चिंताजनक है, जिसमें उन्होंने बिजनौर, मुज़फ्फरनगर और सहारनपुर से आकर उत्तराखंड में बसे भारतीय नागरिकों के “रिवर्स माइग्रेशन” पर विचार करने की बात कही। यह वक्तव्य भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों—विशेष रूप से देश के किसी भी भाग में निवास और बसने के अधिकार—के प्रतिकूल है।

यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश के लोग उत्तराखंड में न तो बाहरी हैं और न ही किसी प्रकार के विदेशी। वे उसी राष्ट्र और मूल राज्य के नागरिक हैं, एक ही संविधान से बंधे हुए हैं, और राज्य के गठन के बाद से उत्तराखंड के सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी ढांचे के विकास में सक्रिय रूप से सहभागी रहे हैं। उन्हें जनसांख्यिकीय असंतुलन का कारण बताना संविधान की “एकता में विविधता” की अवधारणा को कमजोर करता है।

विडंबना यह है कि स्वयं उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों से हजारों लोग रोज़गार और बेहतर जीवन की तलाश में दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर स्थायी रूप से बस चुके हैं और वहां की अर्थव्यवस्था व समाज के विकास में योगदान दे रहे हैं। इसलिए प्रवासन कोई एकतरफा प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक विकासशील राष्ट्र की स्वाभाविक सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है।

यदि वर्ष 2000, जब उत्तराखंड का गठन उत्तर प्रदेश से हुआ, और वर्ष 2025 के उत्तराखंड की तुलना की जाए, तो यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि राज्य ने बुनियादी ढांचे, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। यह विकास मुख्यतः विभिन्न क्षेत्रों से आए निवेश, उद्यमिता और कुशल मानव संसाधन के कारण संभव हुआ, जिसमें विशेष रूप से बिजनौर, मुज़फ्फरनगर और सहारनपुर के लोगों का योगदान सराहनीय रहा है। इस योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

उत्तराखंड को एक छोटे, शांत और संभावनाओं से भरपूर राज्य के रूप में गठित किया गया था। इसकी स्थिरता और खुले वातावरण ने देशभर से निवेश को आकर्षित किया, जिससे विकास, रोज़गार और व्यापार को गति मिली। आज यदि चुनिंदा रूप से अपने ही देशवासियों को जनसांख्यिकीय परिवर्तन के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो यह नीतिगत और प्रशासनिक कमियों से ध्यान हटाने का प्रयास प्रतीत होता है।

इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड में कोई भी व्यक्ति या समुदाय पूर्णतः मूल निवासी होने का दावा नहीं कर सकता। अन्य अनेक लोगों की तरह संभव है कि श्री बिंद्रा के पूर्वज भी किसी अन्य क्षेत्र से आकर यहां बसे हों और राज्य के सामाजिक व राजनीतिक विकास का हिस्सा बने हों। प्रवासन हमेशा से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग रहा है।

इस प्रकार के वक्तव्य, विशेषकर ऐसे व्यक्ति द्वारा दिए जाएं जो संवैधानिक या अर्ध-संवैधानिक पद पर रह चुका हो, अत्यंत जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे बयानों में क्षेत्रीयता और बहिष्कार के बजाय संवैधानिक मूल्यों, समावेशन और राष्ट्रीय एकता की झलक होनी चाहिए।

आज की आवश्यकता नागरिकों को क्षेत्र, जाति या धर्म के आधार पर विभाजित करने की नहीं, बल्कि सभी भारतीयों के मन में राष्ट्रीय भावना और संवैधानिक नैतिकता को सुदृढ़ करने की है। एक सशक्त और प्रगतिशील भारत की नींव संदेह और विभाजन नहीं, बल्कि समान अधिकार, आपसी सम्मान और एकता है।

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