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सिस्टम की साज़िश और कॉर्पोरेट का कब्ज़ा​मज़मून निगार

(Article by):
इंजीनियर सैय्यद फ़रहान अहमद अलिग
(डायरेक्टर: अल-हिरा इंटरनेशनल स्कूल, नवादा, बिहार)
​मामला सिर्फ़ NDTV की मिल्कियत (Ownership) को निगल जाने तक महदूद नहीं रहा, बल्कि अब तो ऐसी मिसालों की पूरी कतार लग गई है।
​हिंदुस्तान में आज सवाल सिर्फ़ माली बदउन्वानी (Corruption) का नहीं है, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह “आफ़ताब-ए-सिस्टम आख़िर रौशनी किसके लिए बिखेर रहा है?” यानी यह पूरा निज़ाम किसके इशारों पर काम कर रहा है?
​’कोस्टल एनरजेन’ के प्रमोटर अहमद ए.आर. बुहारी की मिसाल हमारे सामने है। ED ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार किया और वो तक़रीबन 32 महीने सलाख़ों के पीछे रहे। इसी असीरी (जेल के दौर) के दौरान उनकी कंपनी को दिवालियापन (Insolvency) की तरफ़ धकेल दिया गया, और बाद में ‘अडानी पावर’ से वाबस्ता एक कंसोर्टियम ने उस पर अपना शिकंजा कस लिया।
​आज अदालत ने उन तमाम कार्यवाहियों को ख़ारिज कर दिया है और बुहारी साहब जेल से रिहा हो चुके हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, जब तक इंसाफ़ की सुबह हुई, तब तक एक सनअतकार (Industrialist) अपनी आज़ादी, अपनी साख और अपनी पूरी सल्तनत (कंपनी)—सब कुछ गंवा चुका था।
​यह पूरा वाक़या हमारे जम्हूरिया (Democracy) पर कई संगीन सवालिया निशान खड़े करता है:
​क्या मुल्क की जांच एजेंसियां वाकई आज़ाद और ग़ैर-जानिबदार (Unbiased) हैं?
​क्या हुकूमत की मशीनरी का इस्तेमाल बड़े कॉर्पोरेट घरानों को पुश्त-पनाही (Backing) देने और उन्हें फ़ायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है?
​और अगर आख़िरकार अदालत में ये इल्ज़ामात टिक ही नहीं पाते, तो उन ज़ाया हुए सालों, मजरूह हुई साख और बर्बाद हुए कारोबार की तलाफ़ी (भरपाई) कौन करेगा?
​याद रखिए, किसी भी ज़िंदा जम्हूरियत की बक़ा सिर्फ़ चुनाव कराने से नहीं, बल्कि अदल-ओ-इंसाफ़ करने वाले आज़ाद और निडर इदारों (Institutions) से होती है।

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