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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “मतदाता सूची पुनरीक्षण, वोटरों के हक में बड़ा कदम”

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बड़ा बयान दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यह प्रक्रिया मतदाताओं के लिए पहले से ज्यादा सुविधाजनक और समावेशी है। पहले जहां संक्षिप्त पुनरीक्षण में केवल 7 दस्तावेज मान्य थे, वहीं अब 11 दस्तावेजों का विकल्प उपलब्ध है। कोर्ट का मानना है कि इससे ज्यादा लोगों को शामिल करने में आसानी होगी। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आधार को नागरिकता के प्रमाण के तौर पर स्वीकार न करना सही नहीं है, लेकिन कोर्ट ने अन्य विकल्पों को पर्याप्त माना। चुनाव आयोग ने भी दावा किया कि बिहार के 7.9 करोड़ मतदाताओं में से करीब 6.5 करोड़ को कोई अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं पड़ी।

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वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने तर्क दिया कि दस्तावेजों की संख्या बढ़ने के बावजूद उनकी पहुंच सीमित है। उदाहरण के तौर पर, बिहार में पासपोर्ट धारक केवल 1-2% ही हैं और स्थायी निवासी प्रमाण पत्र का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने इस पर कहा कि राज्य में लगभग 36 लाख पासपोर्ट धारक हैं और दस्तावेजों की सूची सरकारी विभागों से फीडबैक लेकर ही तय की जाती है। 12 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में भी अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना चुनाव आयोग का अधिकार है और आधार या वोटर आईडी को नागरिकता प्रमाण के रूप में न मानने का फैसला बरकरार रहेगा।

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