नई दिल्ली। डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने डॉक्टरों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे से बाहर करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता कानून के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण और जवाबदेही के दायरे में बनाए रखा है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे से बाहर करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि डॉक्टरों को इस कानून के तहत लाने से डॉक्टरों पर मुकदमों का दबाव बढ़ता है और इससे चिकित्सा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पुरानी व्यवस्था को बरकरार रखा है। वर्ष 1995 में Indian Medical Association बनाम V.P. Shantha मामले में शीर्ष अदालत ने माना था कि शुल्क लेकर दी जाने वाली चिकित्सा सेवाएं उपभोक्ता कानून के तहत ‘सेवा’ की श्रेणी में आती हैं।
मरीजों के लिए क्या मायने?
इस फैसले का सीधा मतलब है कि यदि किसी मरीज को चिकित्सा सेवा में कमी या कथित लापरवाही की शिकायत है, तो वह कानून के तहत उपलब्ध उपभोक्ता मंच का सहारा ले सकता है।
हालांकि, हर इलाज में सामने आने वाला खराब परिणाम अपने आप में चिकित्सकीय लापरवाही साबित नहीं करता। किसी डॉक्टर की जिम्मेदारी तय करने के लिए मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखा जाता है।
क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से एक तरफ मरीजों के अधिकार और शिकायत निवारण की व्यवस्था कायम रहती है, वहीं दूसरी तरफ डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही भी बनी रहती है। इस फैसले के बाद चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता कानून से अलग करने की मांग को फिलहाल बड़ा झटका लगा है।





