न्यायाधीश ने कहा कि अगर चुनाव आयोग कानून के खिलाफ जाकर कोई फैसला करता है, तो अदालत उस पर रोक लगा सकती है। इस दौरान फॉर्म-6 में बदलाव की अनुमति को लेकर चुनाव आयोग और अदालत के रुख में अंतर भी सामने आया।
मामला मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म-6 से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से यह कहा गया कि फॉर्म में बदलाव के लिए अदालत की अनुमति ली गई थी। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने इस दावे पर असहमति जताते हुए कहा कि अदालत ने फॉर्म-6 में बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े नियमों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। अदालत ने साफ संकेत दिया कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े किसी भी कदम में कानून और न्यायिक आदेशों का पालन जरूरी है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक संस्थाओं को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर ही फैसले लेने होंगे। यदि किसी निर्णय में कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन पाया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।
फॉर्म-6 मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इसमें बदलाव को लेकर हुई यह सुनवाई चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों के लिहाज से अहम मानी जा रही है। अब इस मामले में अदालत की आगे की सुनवाई और निर्देशों पर नजर रहेगी।





