जॉर्जिया के बातुमी में खेले गए फिडे महिला शतरंज विश्व कप के फाइनल में 19 साल की दिव्या देशमुख ने इतिहास रच दिया। उन्होंने अनुभवी 38 वर्षीय कोनेरू हम्पी को बेहद रोमांचक मुकाबले में हराकर भारत की पहली महिला चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। यह फाइनल सिर्फ एक मुकाबला नहीं था – यह दो भारतीयों के बीच गर्व की जंग थी, जो पहले दो ड्रॉ गेम्स के बाद टाईब्रेकर तक पहुंचा। निर्णायक टाईब्रेकर में हम्पी की एक गलती ने दिव्या को मौका दिया, जिसे उन्होंने बखूबी भुनाया। जीत के बाद दिव्या की आंखों से खुशी के आंसू थम नहीं रहे थे। वह अपनी सीट पर ही फूट-फूटकर रो पड़ीं और अपनी मां से लिपट गईं – ये पल सिर्फ एक जीत का नहीं, सालों की मेहनत और सपनों के पूरे होने का था।
दिव्या की यह जीत न सिर्फ उनके लिए भावनात्मक रूप से खास रही, बल्कि भारत के शतरंज इतिहास में भी एक मील का पत्थर बन गई। इस जीत के साथ उन्होंने ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल किया और साथ ही 2025 के कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिए क्वालिफाई कर लिया, जो विश्व चैंपियन बनने की दिशा में एक बड़ा कदम है। मैच के बाद दिव्या ने कहा कि उन्हें अब भी विश्वास नहीं हो रहा कि उन्होंने यह कर दिखाया है। उन्होंने माना कि उन्हें टूर्नामेंट के सभी नियम भी ठीक से नहीं पता थे, लेकिन हौसला, मेहनत और किस्मत उनके साथ थी। नागपुर की यह बेटी अब भारत की चौथी महिला ग्रैंडमास्टर बन गई हैं, और उनकी यह जीत पूरे देश के लिए गर्व और प्रेरणा का क्षण है।






