Home / News / क्या गणेश चतुर्थी पर भी कर सकते हैं बप्पा का विसर्जन – जानिए आज का शुभ मुहूर्त…..

क्या गणेश चतुर्थी पर भी कर सकते हैं बप्पा का विसर्जन – जानिए आज का शुभ मुहूर्त…..

गणेश चतुर्थी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भावना है – श्रद्धा, आस्था और समर्पण से भरा हुआ एक ऐसा दिन, जब हर दिल “गणपति बप्पा मोरया!” के जयकारों से गूंज उठता है। घरों में बप्पा की स्थापना से लेकर उनका विसर्जन तक, हर पल एक याद बन जाता है।

विसर्जन कब करें? आज भी है मौका!

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या विसर्जन सिर्फ चतुर्थी के दिन ही करना ज़रूरी है? तो इसका जवाब है – नहीं। आप बप्पा का विसर्जन चतुर्थी के दिन, उसके अगले दिन या फिर तीसरे, पांचवे या सातवें दिन भी कर सकते हैं। कई परिवारों में अनंत चतुर्दशी को भी विसर्जन की परंपरा है। यानी श्रद्धा के साथ, अपनी सुविधा के अनुसार भी बप्पा को विदा किया जा सकता है।

व्रत तोड़ने से पहले ना भूलें ये ज़रूरी भोग

जो भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, उनके लिए व्रत का पारण भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। लेकिन याद रखें – व्रत तोड़ने से पहले भगवान गणेश को भोग ज़रूर लगाएं।
भोग में क्या चढ़ाएं? बप्पा को मोदक तो प्रिय हैं ही, लेकिन आप मोतीचूर के लड्डू, केले, नारियल लड्डू, सूजी का हलवा, पंचमेवा, तिल-गुड़ के लड्डू, बेसन के लड्डू या गुड़-चावल की खीर भी अर्पित कर सकते हैं।
इसके बाद, इन्हीं में से किसी एक भोग को पहले खुद ग्रहण करें – यहीं से आपके व्रत का पारण शुरू होता है।

एक भक्त, जिसकी वजह से शुरू हुआ “गणपति बप्पा मोरया” का जयकारा

गणेश चतुर्थी और गणेश विसर्जन से जुड़ी एक बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायक कथा महाराष्ट्र के चिंचवाड़ गांव से जुड़ी है। यहीं जन्मे थे मोरया गोसावी – एक ऐसे भक्त, जिन्हें गणेश जी का अंशावतार माना जाता है।

माना जाता है कि 1375 ईस्वी में वामन भट्ट और पार्वती के घर जन्मे मोरया बचपन से ही गणपति की भक्ति में लीन थे। हर साल गणेश चतुर्थी पर वे चिंचवाड़ से करीब 95 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर तक पैदल यात्रा करते थे — और वो भी लगातार 117 साल तक। सोचिए, कैसी अद्भुत भक्ति रही होगी!

फिर एक दिन, जब उम्र ने उनका साथ देना बंद कर दिया, तो भगवान गणेश ने खुद उनके स्वप्न में आकर कहा, “अब मंदिर आने की ज़रूरत नहीं, मैं खुद तेरे पास आऊंगा।”
अगली सुबह जब मोरया स्नान कर कुंड से निकले, तो उन्हें वही मूर्ति दिखाई दी जो उन्होंने स्वप्न में देखी थी। उन्होंने उस दिव्य मूर्ति को चिंचवाड़ में स्थापित कर दिया – और वहीं से एक नया अध्याय शुरू हुआ।

और यहीं से शुरू हुई वो गूंज – “गणपति बप्पा मोरया!”

चिंचवाड़ की इस मूर्ति को भगवान मयूरेश्वर का अंश स्वरूप माना जाता है। मोरया गोसावी की भक्ति को सम्मान देते हुए आज भी वहां से मयूरेश्वर मंदिर तक डोली यात्रा निकाली जाती है।
और आज जब हम “गणपति बप्पा मोरया!” कहते हैं, तो यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के उस रिश्ते की गूंज है, जो समय और दूरी से परे है।

[post-views]
Share
Now