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स्कूली बच्चियों वो लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, बेट‍ियो, ये तुम्हारी गलती नहीं….

नई दिल्ली: कहीं महीना… कहीं माहवारी… कहीं मेन्स्ट्रुअल साइकल… तो कहीं पीरियड्स… यहां जिसकी बात हो रही है, वो महिलाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा है. लेकिन इसके बावजूद इस बारे में खुलकर बातचीत करने की इजाजत नहीं है. भारतीय समाज में आज भी महिलाओं को होने वाली माहवारी के बारे में न तो बात होती है और न ही इसके बारे में सोचा जाता है. शायद यही कारण है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि मेन्स्ट्रुअल हेल्थ महिलाओं का मौलिक अधिकार है और हर स्कूल को फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी. 

ये फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका पर आया है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि पीरियड आने पर लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके परिवारों के पास पैड पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं होते. इस पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेन्स्ट्रुअल हेल्थ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘मौलिक अधिकार’ है. अदालत ने आदेश दिया कि सभी स्कूलों को 6वीं से 12वीं तक पढ़ने वालीं छात्राओं के लिए फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी. कोर्ट ने सख्त लहजे में ये भी कहा कि अगर इसका पालन नहीं होता है तो स्कूल की मान्यता रद्द की जा सकती है.

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