पश्चिम बंगाल की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे राजनीतिक टकराव अब सीधे राजभवन तक पहुंच गया है। सवाल ये उठ रहा है कि इस स्थिति में राज्यपाल के पास आखिर क्या-क्या विकल्प बचते हैं?
दरअसल, जब कोई मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से मना करता है और उसके बहुमत पर सवाल उठते हैं, तो मामला पूरी तरह संविधान के दायरे में चला जाता है। ऐसे में राज्यपाल की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
सबसे पहला और अहम विकल्प है फ्लोर टेस्ट। राज्यपाल मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं। ये प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे पारदर्शी तरीका मानी जाती है, जिसमें साफ हो जाता है कि सरकार के पास संख्या बल है या नहीं।
अगर मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट से बचने की कोशिश करते हैं, तो राज्यपाल सीधे विधानसभा सत्र बुलाने का निर्देश दे सकते हैं। कई बार सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर चुका है और जल्द फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दे चुका है।
दूसरा विकल्प है—अगर सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाती, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग सकते हैं। लेकिन अगर इसके बावजूद भी इस्तीफा नहीं दिया जाता, तो स्थिति और जटिल हो जाती है।
ऐसे में राज्यपाल के पास तीसरा बड़ा विकल्प होता है—राष्ट्रपति शासन की सिफारिश। Article 356 of the Indian Constitution के तहत राज्यपाल रिपोर्ट भेजकर यह कह सकते हैं कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था ठीक से नहीं चल रही।
हालांकि, ये कदम आखिरी विकल्प माना जाता है और सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो मौजूदा हालात में सबसे ज्यादा संभावना फ्लोर टेस्ट की ही है, क्योंकि यही एक तरीका है जिससे बिना विवाद के स्थिति साफ हो सकती है।
अब निगाहें राजभवन पर टिकी हैं—क्या राज्यपाल तुरंत एक्शन लेंगे या सियासी गतिरोध और लंबा खिंचेगा? आने वाले कुछ दिन पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
पश्चिम बंगाल से बड़ी खबर ममता बनर्जी का इस्तीफा देने से इनकार बोली में नहीं…..






