उत्तराखंड, जिसे ‘देवभूमि’ कहा जाता है, न केवल अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ की गहरी घाटियाँ, ऊँचे पर्वत और वेगवती नदियाँ इसे एक प्राकृतिक चमत्कार भी बनाती हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यही नदियाँ—जैसे भागीरथी, खीरगंगा, अलकनंदा, और ऋषिगंगा—तबाही और त्रासदी का कारण बनती जा रही हैं।
प्रश्न उठता है: क्या ये नदियाँ स्वयं खतरनाक हो गई हैं या हमने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया है कि वे संकट का स्रोत बन गईं?
1. नदियों की भौगोलिक स्थिति और प्रकृति
उत्तराखंड की नदियाँ हिमालय की गोद से निकलती हैं। ये प्राकृतिक रूप से तेज बहाव वाली, संकरी घाटियों से गुजरने वाली, और उच्च ऊंचाई वाले इलाकों से होकर बहने वाली नदियाँ हैं। इस कारण इनके प्रवाह में अनियंत्रण की संभावना हमेशा बनी रहती है।
प्रमुख नदियाँ:
- भागीरथी – गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है।
- अलकनंदा – बद्रीनाथ क्षेत्र से निकलती है।
- ऋषिगंगा – नंदा देवी क्षेत्र से निकलती है।
- खीरगंगा – एक छोटी पर अत्यधिक वेगवती नदी।
2. जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर पिघलना
ग्लेशियर झील विस्फोट (GLOF):
2021 में ऋषिगंगा में जो आपदा आई, वह ग्लेशियर झील के फटने से हुई। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे ऐसी झीलें बन रही हैं जो कभी भी फट सकती हैं।
बारिश का पैटर्न बदलना:
बेमौसम भारी बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएँ बढ़ गई हैं, जिससे नदियों में अचानक बाढ़ आ जाती है
अंधाधुंध विकास और निर्माण कार्य
बड़ी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं:
- टिहरी डैम, विष्णुप्रयाग, श्रीनगर आदि स्थानों पर बने बाँधों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया है।
- सुरंगों और बैराजों के निर्माण से पहाड़ों की स्थिरता प्रभावित हुई है।
चार धाम परियोजना और सड़क निर्माण:
- भारी मशीनों से की गई कटाई और कच्चे निर्माण कार्यों से मिट्टी और चट्टानों का क्षरण बढ़ा है, जिससे भूस्खलन और नदियों के मार्ग में मलबा जमा हो जाता है।
नदियों के किनारे बसे गाँवों और कस्बों में बारिश के दौरान जब भूस्खलन होता है, तो भारी मात्रा में मिट्टी और चट्टानें नदियों में गिरती हैं। इससे नदी का मार्ग अवरुद्ध होता है, और जब वह अवरोध टूटता है, तब भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बहता है और तबाही मचाता है।






