देहरादून।
उत्तराखण्ड में मदरसा शिक्षा के नियमन हेतु प्रस्तावित उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन को लेकर जहां सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर इसके संभावित दुष्परिणामों को लेकर चिंताएं भी सामने आने लगी हैं।
इसी क्रम में सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अहमद सिद्दीकी ने मुख्यमंत्री को ई-मेल के माध्यम से एक विस्तृत प्रतिवेदन भेजकर यह आशंका जताई है कि नए प्राधिकरण के अंतर्गत अयोग्य घोषित होकर बंद होने वाले मदरसों की सार्वजनिक धर्मार्थ संपत्तियों के दुरुपयोग का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
सार्वजनिक दान से बनी संपत्तियों की सुरक्षा पर सवाल
ज्ञापन में कहा गया है कि उत्तराखण्ड के अधिकांश मदरसे—चाहे वे पंजीकृत रहे हों या अपंजीकृत—ज़कात, सदक़ा और सामुदायिक दान के माध्यम से स्थापित एवं संचालित हुए हैं। ऐसे मदरसों की भूमि, भवन और अन्य संपत्तियां निजी नहीं बल्कि सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास की श्रेणी में आती हैं, जिनके प्रबंधक केवल संरक्षक होते हैं, स्वामी नहीं।
मदरसे बंद हुए तो संपत्ति का क्या होगा?
प्रतिवेदन में यह प्रश्न प्रमुखता से उठाया गया है कि यदि कोई मदरसा नए प्राधिकरण के मानकों पर खरा नहीं उतरता और उसे बंद कर दिया जाता है, तो—
उसकी भूमि और भवन का दुरुपयोग या निजीकरण कैसे रोका जाएगा?
क्या बंद होने से पहले अनिवार्य ऑडिट और परिसंपत्ति सत्यापन कराया जाएगा?
क्या सरकार संपत्तियों को अन्य मान्यता प्राप्त मदरसों या अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को हस्तांतरित करने हेतु स्पष्ट नीति बनाएगी?
दुरुपयोग की स्थिति में कानूनी कार्रवाई की मांग
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि यदि बंद मदरसों की संपत्तियों में हेराफेरी या न्यास भंग के मामले सामने आते हैं, तो उनके लिए स्पष्ट कानूनी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहि
मदरसा प्राधिकरण बना, लेकिन नीति नहीं बड़ा सवाल संपत्तियों की सुरक्षा कौन करेगा?






