May 17, 2022

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बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर कोर्ट का बड़ा फैसला 19 को कमिश्नर करेंगे

काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद केस (Kashi Vishwanath Gyanvapi masjid) को लेकर कोर्ट ने कमिश्नर नियुक्त करने का फैसला किया है. नियुक्त कमिश्नर 19 अप्रैल को मंदिर-मस्जिद परिसर का दौरा और वीडियोग्राफी करेगी.

वाराणसी जिला कोर्ट ने सितंबर 2020 में दाखिल याचिका पर दिया आदेश
कमिश्नर 19 अप्रैल को मंदिर-मस्जिद परिसर का करेंगे दौरा
काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद केस को लेकर कोर्ट ने कमिश्नर नियुक्त करने का फैसला किया है. नियुक्त कमिश्नर 19 अप्रैल को मंदिर-मस्जिद परिसर का दौरा और वीडियोग्राफी करेगी. कोर्ट ने इस दौरान सुरक्षाबल तैनात करने का आदेश दिया है, ताकि किसी तरह की कोई अप्रिय घटना न हो.

वाराणसी जिला कोर्ट ने सितंबर 2020 में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया. इस याचिका में परिसर को हिंदुओं को सौंपने की मांग की गई है. याचिकाकर्ताओं ने परिसर के निरीक्षण, रडार अध्ययन और वीडियोग्राफी के लिए कोर्ट से आदेश मांगा था. याचिकाकर्ता का दावा है कि परिसर को हिंदू देवताओं को वापस सौंप दिया जाना चाहिए. इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कमिश्नर नियुक्त किया है.

क्या है विवाद?

ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि इस विवादित ढांचे के नीचे ज्योतिर्लिंग है. यही नहीं ढांचे की दीवारों पर देवी देवताओं के चित्र भी प्रदर्शित है. दावा किया जाता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब ने 1664 में नष्ट कर दिया था. फिर इसके अवशेषों से मस्जिद बनवाई, जिसे मंदिर की जमीन के एक हिस्से पर ज्ञानवापसी मस्जिद के रूप में जाना जाता है.

प्रतिवादी पक्ष (ज्ञानवापी मस्जिद) अंजुमन इंतजामियां मसाजिद कमेटी और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से दाखिल प्रतिवाद पत्र में दावा किया गया कि यहां विश्वनाथ मंदिर कभी था ही नहीं और औरंगजेब बादशाह ने उसे कभी तोड़ा ही नहीं. जबकि मस्जिद अनंत काल से कायम है. उन्होंने अपने परिवाद पत्र में यह भी माना कि कम से कम 1669 से यह ढांचा कायम चला आ रहा है.

कोर्ट पहुंचा मामला

काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी ममले में 1991 में वाराणसी कोर्ट में मुकदमा दाखिल हुआ था. इस याचिका कि जरिए ज्ञानवापी में पूजा की अनुमति मांगी गई. लेकिन कुछ ही दिनों बाद मस्जिद कमेटी ने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का हवाला देकर इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1993 में स्टे लगाकर मौके पर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया. हालांकि, स्टे ऑर्डर की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और फैसले के बाद 2019 में वाराणसी की कोर्ट में फिर से इस मामले की सुनवाई शुरू हो गई. अभी कई अदालतों में इस विवाद को लेकर कई केस दाखिल हैं. जिन पर सुनवाई चल रही है.

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