झालावाड़ से ब्यूरो चीफ आसिफ शेरवानी की रिपोर्ट
लड्डू के पीछे छिपा मर्म और ब्रजेश माहेश्वरी की सोच
✍️डॉ नयन प्रकाश गांधी
मैनेजमेंट विश्लेषक, मीडिया स्तंभकार
कोटा में जब किसी बच्चे के हाथ में लड्डू आता है तो लोग उसे मिठाई समझ कर मुस्कुरा देते हैं
जनाब समझिए, यह लड्डू नहीं है।यह उस बच्चे के दो साल तीन साल की तपस्या का प्रतीक है। यह उन रातों का प्रतीक है जब पूरा शहर सो रहा था और एक पंद्रह सोलह साल का बच्चा अपने कमरे में फॉर्मूले याद कर रहा था। यह उस माँ के आँसुओं का प्रतीक है जिसने अपने बच्चे को हजारों किलोमीटर दूर कोटा भेजा था। यह उस पिता के पसीने का प्रतीक है जिसने अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा फीस, हॉस्टल और किताबों में लगा दिया।
एलन का लड्डू दरअसल सफलता का प्रमाण पत्र है
ब्रजेश माहेश्वरी को समझना हो तो सिर्फ रिजल्ट मत देखिए, उनकी सोच देखिए ब्रजेश माहेश्वरी जी ने कोटा को सिर्फ कोचिंग का शहर नहीं बनाया, उन्होंने कोटा को सपनों का शहर बनाया। उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था खड़ी की जहाँ गाँव का गरीब बच्चा भी यह सपना देख सके कि वह भी आईआईटी में जा सकता है, वह भी डॉक्टर बन सकता है। उनकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि वे बच्चे को सिर्फ पढ़ाते नहीं, उसे लड़ना सिखाते हैं। सुबह से रात तक क्लास, टेस्ट, डाउट, रैंक, विश्लेषण, बच्चा धीरे धीरे समझ जाता है कि जिंदगी में सफलता ऐसे ही नहीं मिलती, उसे मेहनत से हासिल करना पड़ता है।ब्रजेश माहेश्वरी जी का एक लड्डू इसी मेहनत की मिठास है।लड्डू का मतलब है चयन की घोषणा,कोटा में लड्डू बंटना मतलब एक और बच्चा आईआईटी में गया, एक और बच्चा एनआईटी में गया, एक और बच्चा मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर बनने गया।यह लड्डू बताता है कि इस बच्चे ने लाखों बच्चों की भीड़ में अपनी जगह बनाई है। आईआईटी, एनआईटी, मेडिकल कॉलेज की सीट कोई सीट नहीं, यह एक भविष्य है। एक परिवार का सपना है। एक गाँव का गौरव है।इसलिए जब एलन लड्डू बाँटती है तो वो मिठाई नहीं बाँट रही होती, वो उम्मीद बाँट रही होती है कि अगला लड्डू तुम्हारे बच्चे के हाथ में भी हो सकता है।
लड्डू के पीछे छिपा मर्म यही है
देश के प्रतिष्ठित स्टूडेंट मोटिवेटर ,इंस्पिरेशनल कोच इंडियन आइकन एक्सीलेंस अवॉर्डी आदरणीय ब्रजेश माहेश्वरी जी का मर्म यह है कि हर बच्चे को लगे कि वह अकेला नहीं है। उसका शिक्षक उसके साथ है। उसकी संस्था उसके साथ है। उसका शहर उसके साथ है।वे जानते हैं कि एक लड्डू बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ा देता है। माता पिता का सीना चौड़ा कर देता है। गाँव में एक संदेश जाता है कि मेहनत रंग लाती है।
यही कारण है कि एलन का एक लड्डू पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है और इसे चर्चा में लाने वाले मोटिवेटर करोड़ो स्टूडेंट के प्रिय बीएम सर है। क्योंकि लोग समझ गए हैं कि यह लड्डू मिठाई की दुकान का लड्डू नहीं, यह सफलता का लड्डू है।
दूसरा पहलू भी ब्रजेश माहेश्वरी जी समझते हैं
जिस बच्चे के हाथ में लड्डू आया वो मुस्कुरा रहा है। लेकिन जिस बच्चे के हाथ में लड्डू नहीं आया, उसके लिए भी ब्रजेश माहेश्वरी जी की सोच में जगह है ।उनका संदेश हमेशा यही रहा है कि हर बच्चा आईआईटी नहीं जाएगा, लेकिन हर बच्चा जिंदगी में कुछ बड़ा जरूर कर सकता है। लड्डू सफलता का प्रतीक है, असफलता का पैमाना नहीं होना चाहिए।एक सच्चे शिक्षक की पहचान यही है कि वह सफल बच्चे का उत्सव भी मनाए और असफल बच्चे को भी गले लगाकर कहे कि बेटा हिम्मत मत हार, तेरा समय भी आएगा। ब्रजेश माहेश्वरी जी ने यही संस्कार एलन को दिया है।
असली जीत क्या है
असली जीत वो नहीं है जब बच्चा आईआईटी में चला जाए। असली जीत वो है जब बच्चा कोटा से लौटे तो वो टूटा हुआ न हो, वो मानसिक रूप से मजबूत हो, उसे लगे कि उसने हार नहीं मानी, और उसके माता पिता कहें कि बेटा तूने कोशिश की, हमें तुझ पर गर्व है।
वो लड्डू तभी सार्थक है जब वो दबाव का नहीं, प्रेरणा का प्रतीक बने।
निष्कर्ष, लड्डू को मिठाई मत समझिए
इसलिए जनाब अगली बार जब कोटा में लड्डू बंटे तो उसे सिर्फ मिठाई मत समझिए।समझिए कि यह एक लड्डू नहीं, एक बच्चे का सपना है। एक माँ बाप की प्रार्थना है। एक शिक्षक की मेहनत है। और एक शहर की पहचान है।और इस पहचान के पीछे एक नाम है, ब्रजेश माहेश्वरी।
जिन्होंने एक लड्डू को सिर्फ मिठाई नहीं रहने दिया, उसे सपनों का प्रतीक बना दिया। जिन्होंने हजारों बच्चों को यह विश्वास दिया कि अगर मेहनत सच्ची हो तो लड्डू तुम्हारे हाथ में भी आएगा।





