भाजपा के पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावती रुख अख़्तियार कर लिया है। उन्होंने राजपूत समुदाय की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब बिहार की राजनीति में राजपूत मतदाता – जो कुल वोट का लगभग 3.45% हैं – भाजपा का कोर वोट बैंक माने जाते हैं।
इस बगावत को भाजपा के लिए राजनीतिक झटका माना जा रहा है, लेकिन पार्टी के भीतर से जो संकेत मिल रहे हैं, वे कहानी का एक अलग ही पहलू दिखाते हैं।
भाजपा का जवाब: “आरके सिंह बड़े नेता नहीं, कोई खास नुकसान नहीं होगा”
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आरके सिंह को राजपूतों के बड़े नेता के तौर पर नहीं देखा जाता है। पिछले चुनाव में उनकी लोकसभा सीट से हार भी इसी disconnect का नतीजा मानी गई थी — जनता से जुड़ाव की कमी और क्षेत्र में कम उपस्थिति।
भाजपा नेताओं का मानना है कि आरके सिंह की नाराज़गी ज्यादा व्यक्तिगत है और पार्टी से उनका मोहभंग बहुत गहरा नहीं है। “उन्हें मनाने की कोशिश की जाएगी,” एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा।
योगी और रूड़ी: भाजपा का ठाकुर ट्रंप कार्ड
पार्टी का दावा है कि अगर कुछ नाराज़गी उपजी भी है, तो जैसे ही योगी आदित्यनाथ बिहार में चुनाव प्रचार में उतरेंगे, माहौल पूरी तरह बदल जाएगा।
राजीव प्रताप रूड़ी, जो खुद राजपूत समुदाय से हैं, को बिहार में राजपूतों का सबसे प्रभावशाली चेहरा माना जाता है। उनकी जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ाव भाजपा के लिए एक स्थायी पूंजी की तरह है।
योगी आदित्यनाथ को भाजपा का “ठाकुर ट्रंप कार्ड” बताया जा रहा है। बिहार का ठाकुर समुदाय उन्हें सांस्कृतिक और वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में देखता है।
ठाकुर वोटों की सियासत: 2014 के बाद भाजपा की पकड़ मज़बूत हुई
2014 के पहले तक बिहार में राजपूतों का बड़ा वर्ग लालू यादव के साथ खड़ा था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनावों में राजपूतों का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा और यह वर्ग अब भाजपा का मजबूत वोटबैंक बन चुका है।
2020 में:
भाजपा ने 21 राजपूत उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 15 विजयी हुए।
जदयू के 7 में से सिर्फ 2 ही जीत सके।
एनडीए ने कुल 29 राजपूत प्रत्याशियों को टिकट दिया, जिनमें से 19 विजयी रहे।
महागठबंधन ने 18 राजपूतों को टिकट दिया, लेकिन कांग्रेस के 10 में से सिर्फ 1 ही जीत पाया, जबकि राजद के 7 प्रत्याशी जीत गए।
क्या BJP को वाकई नुकसान होगा?
पार्टी का तर्क है कि BJP को वोट केवल जाति या चेहरे के आधार पर नहीं मिलता, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, राष्ट्रीयवादी नीतियां और विकास कार्य उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं।
ऐसे में पार्टी मानती है कि अगर आरके सिंह नई पार्टी बनाते हैं या विपक्ष के साथ जाते हैं, तब भी इसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।






