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NIA कोर्ट का चौंकाने वाला फैसला: साध्वी प्रज्ञा सहित सभी को राहत!

गुरुवार सुबह मुंबई के एक अदालत परिसर में माहौल कुछ अलग था। कड़ी सुरक्षा के बीच सात चेहरे वहां पहुंचे थे – कुछ थके हुए, कुछ शांत, लेकिन सभी की आंखों में 17 साल पुराना इंतजार झलक रहा था। ये वही लोग थे, जिन पर सितंबर 2008 में मालेगांव में हुए बम धमाके की साजिश रचने का आरोप लगा था। आज कोर्ट ने फैसला सुनाया – सबको बरी कर दिया गया।

क्या हुआ था 2008 में?

29 सितंबर 2008। महाराष्ट्र के मालेगांव शहर की एक आम शाम। एक मस्जिद के पास खड़ी मोटरसाइकिल में जोरदार धमाका हुआ। 6 लोग मारे गए, 100 से ज़्यादा घायल हो गए। शहर में अफरा-तफरी मच गई। कई ज़िंदगियां हमेशा के लिए बदल गईं।

जल्द ही यह धमाका एक बड़ा केस बन गया – आरोप लगे कि इसे कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने अंजाम दिया, मुस्लिम समुदाय को डराने के इरादे से। जांच NIA को सौंपी गई। और फिर जो हुआ, वो एक लंबी कानूनी लड़ाई की शुरुआत थी।

कोर्ट का क्या कहना था?

विशेष एनआईए अदालत के जज एके लाहोटी ने कहा कि:

  • सबूत पक्के नहीं थे। जांच में कई खामियां थीं।
  • विस्फोट में जो मोटरसाइकिल इस्तेमाल हुई, वो प्रज्ञा ठाकुर की है – ये भी साबित नहीं हो सका।
  • ये भी साफ नहीं हुआ कि धमाका मोटरसाइकिल में लगे बम से ही हुआ था।
  • यूएपीए जैसे कड़े कानून लगाने लायक कोई ठोस आधार अदालत को नहीं मिला।

कौन थे आरोपी?

इन सात लोगों पर आरोप लगे थे:

  • प्रज्ञा सिंह ठाकुर (अब भोपाल से बीजेपी सांसद)
  • लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित
  • मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय
  • अजय राहिरकर
  • सुधाकर द्विवेदी
  • सुधाकर चतुर्वेदी
  • समीर कुलकर्णी

इन सभी पर आतंक फैलाने, हत्या की साजिश, अवैध हथियार रखने जैसे गंभीर आरोप लगे थे। लेकिन अदालत ने कहा – “संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

17 साल का इंतजार, कई सवाल बाकी

इस फैसले ने एक अध्याय बंद ज़रूर किया है, लेकिन कई सवाल अब भी ज़िंदा हैं। धमाका हुआ था, लोग मरे थे – पर सच कौन था?, गुनहगार कौन था?, इसका जवाब अब भी अधूरा है।

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