मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भोजशाला को मां वाग्देवी यानी सरस्वती मंदिर माना है। कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के सिद्धांतों को आधार बनाया और मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति देने वाले 2003 के ASI आदेश को रद्द कर दिया।
इंदौर बेंच की जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने 242 पन्नों के फैसले में कहा कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप मंदिर का है। कोर्ट ने ऐतिहासिक साहित्य, स्थापत्य साक्ष्य और ASI सर्वे रिपोर्ट के आधार पर माना कि यहां देवी सरस्वती का मंदिर मौजूद था और हिंदुओं की पूजा की परंपरा लगातार जारी रही।
कोर्ट ने कहा कि विवादित स्थल के धार्मिक चरित्र का निर्धारण करते समय सुप्रीम कोर्ट के 2019 अयोध्या फैसले में तय 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखा गया। इन सिद्धांतों में आस्था, पूजा की निरंतरता, पुरातात्विक साक्ष्य और संभावनाओं के आधार पर निर्णय जैसे पहलू शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI द्वारा मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति देने वाले आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि यह आदेश हिंदुओं के पूजा अधिकारों को सीमित करता था। साथ ही कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो धार जिले में मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक जमीन की मांग कर सकता है।
फैसले में केंद्र सरकार और ASI को भोजशाला परिसर के प्रबंधन और संरक्षण पर निर्णय लेने के निर्देश भी दिए गए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ASI परिसर की सुरक्षा, संरक्षण और धार्मिक गतिविधियों की निगरानी करता रहेगा।
इस फैसले के बाद भोजशाला विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है। माना जा रहा है कि अयोध्या फैसले के सिद्धांतों के इस्तेमाल से यह निर्णय भविष्य में धार्मिक स्थलों से जुड़े अन्य मामलों पर भी असर डाल सकता है






