Home / Updates / व्यापार भी, सेवा भी: जानिए जयपुर के अब्दुल लतीफ , आरको की अनोखी दुनिया”

व्यापार भी, सेवा भी: जानिए जयपुर के अब्दुल लतीफ , आरको की अनोखी दुनिया”


जयपुर, जिसे लोग गुलाबी नगरी भी कहा जाता है कहते हैं, अपनी खूबसूरत संस्कृति के लिए तो मशहूर है ही, साथ ही उन लोगों के लिए भी जो समाज में अच्छे बदलाव लाते हैं। राजधानी के चीनी की बुर्ज में रहने वाले अब्दुल लतीफ, जिन्हें पुरे राजस्थान में लोग ‘आरको’ के नाम से पहचानते हैं, ऐसे ही एक खास इंसान हैं। 1946 में जयपुर के पास चोमू के एक छोटे से गांव में जन्मे अब्दुल लतीफ की कहानी एक साधारण परिवार से शुरू होती है। उनके पिता रहमतुल्लाह और माँ हफीजन ने उन्हें मेहनत, ईमानदारी और लोगों की मदद करने का जज़्बा सिखाया, जो उनकी ज़िंदगी का आधार बना।
अब्दुल लतीफ की कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं, बल्कि एक ऐसे शख्स की है, जिसने अपने व्यापार और समाज सेवा को मिलाकर लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने का रास्ता चुना। उनकी कंपनी, अब्दुल रज्जाक एंड कंपनी (आरको), आज एक बड़ा नाम है, जिसे लोग इलेक्ट्रिक मोटर, पंखे, कूलर और समाज सेवा के लिए जानते हैं। इसके अलावा, उनकी होटल आरको पैलेस, जो सिंधी कैंप बस स्टैंड के पास है, उनकी मेहनत और दूर की सोच का प्रतीक है।


व्यापारी से समाजसेवी तक


1960 के दशक में, जब भारत आज़ादी के बाद तेज़ी से बदल रहा था, अब्दुल लतीफ ने 1958 से 1962 तक इलेक्ट्रिक का काम सीखा। 1962 में, उन्होंने अपनी मेहनत से अब्दुल रज्जाक एंड कंपनी शुरू की। शुरू में यह एक छोटी-सी दुकान थी, जहाँ इलेक्ट्रिक मोटर ठीक किए जाते थे। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई, और वे सामान बनाने लगे। उनकी कंपनी ने इलेक्ट्रिक मोटर, पंखे, कूलर और पानी के पंप बनाए, जो पूरे भारत में भेजे जाने लगे। 1972 में, अब्दुल लतीफ ने एक और बड़ा कदम उठाया और कॉटन टेप की फैक्ट्री शुरू की, जो मोटरों के लिए ज़रूरी चीज़ थी। यह काम न सिर्फ़ व्यापार में कामयाब रहा, बल्कि पूरे देश में उनके सामान की माँग बढ़ गई। लेकिन 1992 में बाबरी मस्जिद का विवाद उनके लिए मुश्किल समय लाया। उनका व्यापार छोटा हो गया, कुछ व्यापारियों ने उनका पैसा नहीं दिया, और लेन-देन रुक गया। इस मुश्किल वक़्त में अब्दुल लतीफ ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने अपनी कंपनी का नाम छोटा करके आरको इंटरप्राइजेज और आरको इंडस्ट्रीज कर दिया और एक नई राह चुनी। 1992 के बाद, उन्होंने होटल का व्यापार शुरू किया। जयपुर के सिंधी कैंप में उनकी होटल आरको पैलेस, जिसमें आज 125 कमरे हैं, उनकी मेहनत का नतीजा है। यह होटल न सिर्फ़ व्यापार की मिसाल है, बल्कि समाज सेवा का भी एक बड़ा केंद्र है। अब्दुल लतीफ ने अपने व्यापारिक अनुभव को दूसरे क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया। वे पैट्रो फील्ड, बड़ौदा और जयपुर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशक रहे, जहाँ उन्होंने अपनी नेतृत्व की ताकत और समाज के लिए ज़िम्मेदारी दिखाई।


मंसूरी पंचायत और दहेज-मुक्त शादियाँ


अब्दुल लतीफ का दिल हमेशा लोगों की भलाई के लिए धड़कता रहा। मंसूरी पंचायत के अध्यक्ष के तौर पर, उन्होंने 2001 से समाज सेवा शुरू की। उनका सबसे बड़ा काम रहा सामूहिक शादी समारोहों का आयोजन। इन समारोहों का मकसद था समाज में दहेज की बुराई को कम करना और सादगी से शादी को बढ़ावा देना।
अब्दुल लतीफ कहते हैं कि हम लोगों के खर्चे बचाते हैं ताकि दहेज में पैसा न जाए। भाई, आप लाखों रुपये न बर्बाद करें। हज़ारों में शादी कर लें, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाएँ। 2001 से लॉकडाउन तक, उन्होंने 22-23 सामूहिक शादी समारोह किए, जिनमें हर समारोह में 50 से 140 जोड़ों की शादी कराई गई। अनुमान है कि अब तक 2,000 से 3,000 जोड़ों की शादी उनके प्रयासों से हुई। लॉकडाउन के बाद, जब सामूहिक समारोह रुक गए, तो अब्दुल लतीफ ने अपनी होटल आरको पैलेस को इस अच्छे काम का ठिकाना बना दिया। वे कहते हैं कि कोई कहे, ‘साहब, मेरी बेटी की कल शादी करनी है,’ तो आ जाओ, कर देंगे। वे एक-एक जोड़े की शादी भी कम खर्च में कराते हैं, जिसमें 25-25 मेहमानों के लिए खाना और दूल्हा-दुल्हन के लिए जोड़ा दिया जाता है। उनका मानना है कि इस्लाम में दहेज की कोई जगह नहीं, इसलिए वे दहेज को बढ़ावा नहीं देते। मंसूरी पंचायत रिश्तों की तलाश में भी मदद करती है। लोग अपने बच्चों का बायोडाटा जमा करते हैं, और अब्दुल लतीफ की टीम उनके लिए सही जोड़े ढूंढकर मिलवाती है। इसके अलावा, शादीशुदा ज़िंदगी में परेशानियाँ या परिवार में झगड़े सुलझाने के लिए भी पंचायत काम करती है। हर महीने 20-25 ऐसे मामले निपटाए जाते हैं। उनके पास 10 वकीलों की एक टीम है, जिसमें उनके पोता और नवासी भी शामिल हैं, जो ज़रूरतमंदों को कम खर्च में कानूनी मदद देते हैं।


सम्मान समारोह और तालीमी बेदारी


अब्दुल लतीफ का मानना है कि पढ़ाई समाज को बदलने का सबसे बड़ा ज़रिया है। 2001 से, वे हर साल बच्चों के लिए सम्मान समारोह करते हैं। शुरू में 40-50 बच्चों को सम्मानित किया जाता था, लेकिन अब यह संख्या 300 तक पहुँच गई है। 10वीं और 12वीं में 85% से ज़्यादा नंबर लाने वाले बच्चों और हाफिज-ए-कुरान को नकद पुरस्कार और सम्मान दिया जाता है। अब तक करीब 5,000-6,000 बच्चों को सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा, अब्दुल लतीफ ने पढ़ाई के लिए और कदम उठाए। उन्होंने इस साल जयपुर में दो स्कूल शुरू किए पहला आरको किड्स स्कूल,जो जयपुर के शास्त्री नगर में (आठवीं तक) और दूसरा हसनपुरा की बनजारा बस्ती में (पांचवीं तक)। साथ ही, पिछले छह-सात सालों से वे कोचिंग सेंटर भी चला रहे हैं, जो बच्चों को अंग्रेजी बोलना और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं।
कौमी सहूलत एजुकेशनल फंड के अध्यक्ष के तौर पर, उनका आने वाला प्लान है कि हाफिज-ए-कुरान बच्चों को ग्रेजुएशन और प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे आरएएस, आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर) के लिए पैसे और पढ़ाई की मदद दी जाए। वे कहते हैं कि गरीब का बच्चा हाफिज होता है, लेकिन उसके पास ग्रेजुएशन तक के पैसे नहीं होते। हम एक फंड बनाकर उनकी मदद करना चाहते हैं।


बुनकरों और सहकारी काम के लिए योगदान


1992-1995 तक राजस्थान राज्य बुनकर सहकारी संघ के चुने हुए अध्यक्ष के तौर पर, अब्दुल लतीफ ने बुनकरों के हक की रक्षा के लिए बड़े कदम उठाए। उस समय, कुछ व्यापारी पावर लूम का कपड़ा लाकर हैंडलूम के नाम पर बेचते थे, जिससे बुनकरों को नुकसान होता था। अब्दुल लतीफ ने इस गलत काम को बंद करवाया और यह सुनिश्चित किया कि सिर्फ़ बुनकरों द्वारा बनाया गया कपड़ा ही सरकार को भेजा जाए। इससे बुनकरों को नौकरी और इज़्ज़त दोनों मिली।


दलित-मुस्लिम एकता और समाज में भाईचारा


राजस्थान दलित मुस्लिम एकता मंच के अध्यक्ष के तौर पर, पिछले 16 सालों से अब्दुल लतीफ हिंदू-मुस्लिम झगड़ों को रोकने और दलित-मुस्लिम समुदायों के बीच एकता बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मुसलमान और दलित आसपास रहते हैं। हमारा खाना-पीना, गरीबी एक जैसी है। कुछ गलत लोग लालच देकर हमें लड़वाते हैं। उनकी टीम झगड़ों वाले इलाकों में जाती है, लोगों को समझाती है, और पुलिस केस या जेल से बचाने के लिए जमानत और समझौते करवाती है।


ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल और सच्चर कमेटी


ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के राजस्थान सचिव के तौर पर, अब्दुल लतीफ ने मुस्लिम समुदाय की भलाई के लिए कई कदम उठाए। 2007 में, उन्होंने अपने लोगों के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की और मुस्लिम समुदाय की मुश्किलों जैसे आरक्षण, पढ़ाई, अस्पताल की सुविधाएँ और बस्तियों की हालत पर बात की। उनके मुताबिक उनकी इस कोशिश के बाद सच्चर कमेटी बनी, जिसकी सलाह पर मुस्लिम समुदाय के लिए स्कॉलरशिप जैसी ज़रूरी योजनाएँ शुरू हुईं। इससे पढ़ाई के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया।


युवाओं के लिए नौकरी और भविष्य की योजनाएँ


अब्दुल लतीफ ने तीन आईटीआई कॉलेज खोले, जो सात साल तक चले। इनके ज़रिए करीब 3,500 बच्चों को ट्रेनिंग और नौकरी के मौके मिले। लेकिन बाद में बिजली बोर्ड में ठेके शुरू होने से आईटीआई की माँग कम हो गई, और इन्हें बंद करना पड़ा। फिर भी, अब्दुल लतीफ का मानना है कि भविष्य में पढ़ाई और नौकरी के नए रास्ते बनाए जा सकते हैं।


अब्दुल लतीफ आरको न सिर्फ़ एक कामयाब व्यापारी हैं, बल्कि एक ऐसे समाजसेवी भी हैं, जिन्होंने अपने कामों से हज़ारों लोगों की ज़िंदगी बदली। चाहे वह दहेज-मुक्त शादियाँ करवाना हो, पढ़ाई को बढ़ावा देना हो, बुनकरों के हक की लड़ाई हो, दलित-मुस्लिम एकता को मज़बूत करना हो, या समाज की आवाज़ उठाना हो, उनकी हर कोशिश समाज में अच्छे बदलाव की मिसाल है। वे कहते हैं कि लोगों की सेवा का जज़्बा ही मेरी ताकत है। आज, जयपुर सहित अब्दुल लतीफ़ ‘आरको’ का नाम न सिर्फ़ एक ब्रांड है, बल्कि भरोसे, मेहनत और समाज सेवा का प्रतीक है। अब्दुल लतीफ की कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो अपने छोटे-छोटे प्रयासों से समाज को बेहतर बनाना चाहता है।

[post-views]
Share
Now