राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष पर नागपुर में विजयदशमी उत्सव के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देशवासियों को संबोधित किया। उन्होंने गुरु तेग बहादुर, महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के योगदान को याद करते हुए कहा कि बलिदान, भक्ति और देशसेवा जैसे आदर्श आज भी समाज के लिए प्रेरणा हैं। इस मौके पर उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे देश ने एकजुट होकर दुश्मनों को जवाब दिया और दुनिया में अपने असली मित्रों को पहचाना।

बता दे की अपने संबोधन में भागवत ने मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे पर सवाल उठाए और चेताया कि केवल उस पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्थाएं शोषण और पर्यावरणीय संकट को जन्म देती हैं। इसलिए भारत को आत्मनिर्भर और स्वदेशी जीवनशैली अपनाने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने पड़ोसी देशों में हो रही हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता पर चिंता जताई और कहा कि परिवर्तन हमेशा लोकतांत्रिक तरीकों से ही संभव है, हिंसा केवल अस्थिरता और बाहरी हस्तक्षेप का रास्ता खोलती है।
वही मोहन भागवत ने हिमालय में बढ़ती आपदाओं को चेतावनी मानते हुए कहा कि हमें विकास की दिशा पर फिर से विचार करना होगा। उन्होंने साफ कहा कि भौतिक विकास के साथ-साथ नैतिक और मानवीय मूल्यों का उत्थान भी जरूरी है। दुनिया आज भारत से आशा की नजरों से देख रही है, इसलिए भारत को अपना विशिष्ट विकास मॉडल तैयार कर विश्व को मार्गदर्शन देना चाहिए। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि बदलाव व्यवस्था से नहीं, बल्कि लोगों के आचरण और जीवन मूल्यों से शुरू होता है।






