मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर पुराना जख्म हरा हो गया है। पांच साल पहले गिर चुकी कमलनाथ सरकार की कहानी एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह बनी है कांग्रेस के दो दिग्गज नेता — दिग्विजय सिंह और कमलनाथ — जो एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार गिराने का ठीकरा फोड़ते नज़र आ रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में वो राज़ खोला जो अब तक बंद कमरे तक ही सीमित था। उनका कहना है कि सरकार उनके कारण नहीं, बल्कि कमलनाथ की वजह से गिरी। उधर, कमलनाथ ने भी सोशल मीडिया पर पलटवार करते हुए साफ कहा कि सिंधिया की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और ये भावना कि सरकार दिग्विजय चला रहे हैं — यही कारण था कांग्रेस से उनके अलग होने और सरकार गिरने का।
इन बयानों के बीच अब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी चुप नहीं बैठे। दिल्ली में एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने पहली बार इस पूरे विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ी। सिंधिया ने कहा, “मैं अतीत में नहीं जाना चाहता,” लेकिन साथ ही ये भी जता दिया कि किस तरह उस वक़्त उनकी बातों को नजरअंदाज़ किया गया। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने वादों को निभाने के लिए सरकार से काम करवाने की कोशिश की, लेकिन जब बात सम्मान और स्वाभिमान की आई — तो उन्हें एक्शन लेना पड़ा। “अगर बातें बंद कमरे में होतीं तो मैं चुप रहता, लेकिन जब सार्वजनिक मंचों से मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ बातें होने लगीं, तब फैसला लेना जरूरी हो गया,” सिंधिया बोले। उनके इस बयान से साफ झलकता है कि 2020 में कांग्रेस की हार किसी बाहरी साजिश की नहीं, बल्कि आपसी खींचतान और अहं की लड़ाई का नतीजा थी। साफ है — इस बार कांग्रेस किसी और से नहीं, खुद से हारी थी।






