अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान के बंदरगाहों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे कई जहाजों को रोककर वापस लौटा दिया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड, यानी CENTCOM के अनुसार, सोमवार से लागू की गई समुद्री नाकाबंदी के बाद अब तक कोई भी जहाज इस घेराबंदी को पार नहीं कर सका है।
दूसरी ओर, ईरान ने कड़ी चेतावनी दी है। उसका कहना है कि अगर अमेरिका ने यह नाकाबंदी नहीं हटाई, तो वह खाड़ी क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है। इससे वैश्विक तेल और व्यापार मार्गों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक अहम बयान दिया है। उन्होंने बताया कि इजराइल और लेबनान के नेता आज सीधे बातचीत करने वाले हैं। पिछले 34 सालों में यह पहला मौका होगा जब दोनों देश आमने-सामने संवाद करेंगे। इससे पहले वे 1991 की Madrid Conference में मिले थे।
इसी दौरान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत भी एक अहम मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। 21 अप्रैल को समाप्त होने वाले सीजफायर से पहले दोनों देशों के बीच समझौते की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, कुछ मुद्दों पर अब भी मतभेद बने हुए हैं।
तेहरान में कूटनीतिक हलचल तेज है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir ईरान पहुंच चुके हैं और उन्होंने विदेश मंत्री Abbas Araghchi से मुलाकात की है। बताया जा रहा है कि वे अमेरिका का संदेश लेकर आए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं।
वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance और अन्य वरिष्ठ अधिकारी प्रस्ताव तैयार करने और बातचीत को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। खबर है कि जरूरत पड़ने पर सीजफायर को बढ़ाया भी जा सकता है, हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पिछले 24 घंटों में हालात और भी तेजी से बदले हैं:
- अमेरिका का दावा है कि होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी के बाद कोई जहाज ईरान के बंदरगाह तक नहीं पहुंच पाया।
- ईरान ने रेड सी, ओमान सागर और पर्शियन गल्फ में व्यापार रोकने की चेतावनी दी है।
- लेबनान में इजराइली हमलों में मरने वालों की संख्या 2,000 से अधिक हो गई है, जबकि हजारों लोग घायल हैं।
- परमाणु मुद्दे पर अमेरिका-ईरान वार्ता में कुछ प्रगति के संकेत मिले हैं।
- इजराइल ने दावा किया है कि उसने दक्षिणी लेबनान में कई ठिकानों को निशाना बनाया है।
- कुल मिलाकर, मध्य पूर्व की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है, जहां कूटनीति और सैन्य कार्रवाई दोनों साथ-साथ चल रही हैं।






