Thu. Dec 3rd, 2020

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कोरोना महामारी ने वैश्विक रूप से अनेक प्रकार से लोगों को किया प्रभावित ,

कोरोना महामारी ने वैश्विक रूप से अनेक प्रकार से लोगों को प्रभावित किया, इसके दुष्प्रभावो में शारीरिक मानसिक दुष्प्रभावों के साथ आजीविका संकट भी बड़े रूप में सामने आया ऐसे समय में देश के अनेक महानगरों में स्थायी पलायन कर चुके प्रवासी भी लॉकडाउन के कारण पहाड़ लौटे और उनमें से अधिकांश कोई सकारात्मक योजना न होने के कारण अनलॉक प्रक्रिया शुरू होते ही वापस भी चले गए। ऐसे समय मे कुछ युवाओं को अपनी माटी के समीप रहने का मौका मिला और परदेश में रहकर अर्जित ज्ञान को मातृभूमि में साकार करने की ललक से उन्होंने पहाड़, सरकार और समाज के लिए एक सफल मॉडल तैयार किया जिसका जीता जागता उदाहरण हैं लमगड़ा विकासखंड में शहरफाटक के समीप डोल (मुल्याधारा) के हरीश बहुगुणा।

अल्मोड़ा। हरीश आजीविका की तलाश में स्नातक की पढ़ाई के बाद 1999 में गाँव से महानगर की तरफ चले गए थे। 20 वर्षो तक उन्होंने दिल्ली,हरियाणा के अनेक प्रतिष्ठानों में काम किया और स्थायी रूप से  रोहिणी दिल्ली में बस गए पहाड़ के प्रति लगाव तो था लेकिन काम की आपाधापी और पारिवारिक जीवन के निर्वाह के बीच पहाड़ आना कम होता था,कोरोना के कारण हुए  लॉक डाउन के कारण बच्चो के स्कूल तो बन्द हुए ही हरीश का अर्बन गार्डनिंग का काम भी प्रभावित हो गया समय का सदुपयोग करने जून के पहले हफ्ते गावँ लौटे तो चारों तरफ बीरानगी देखकर एक नए प्रयास में जुट गए।देश के अन्य पर्वतीय राज्यों में फैले मित्रो से सलाह मशविरा कर केसर,रोजमेरी,तेजपत्ता और कैमोमिल के पौधे तैयार किये। बरसात में लिंगुण का अचार, अखरोट, नाशपाती आदि के उत्पाद बनाकर स्थानीय बाजार के साथ सोशल मीडिया के माध्यम से बाहर भी भेजे।शहर फाटक से जलना तक का यह क्षेत्र 70 के दशक में फल पट्टी के रूप में विकसित किये जाने की योजना भी तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाई थी,फल सब्जियों के उत्पादन की असीम सीमा वाले इस क्षेत्र में उत्पादन और विपणन के बीच की खाई किसानों को उदासीन बनाती है, एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि तीन जिलों की सीमा से मिला यह क्षेत्र भांग की अवैध खेती के साथ मादक पदार्थो की तस्करी के लिए भी कुख्यात रहा केसर ,रोजमेरी,कैमोमिल लेमनग्रास, आदि नकदी फसलों से भांग की अवैध खेती भी हतोत्साहित होगी ।हरीश आज सफलता पूर्वक औषधीय एवम सगंध पौधों को उगा रहे हैं कीवी,परसीमन काकी,अवाकाडो आदि विदेशी प्रजाति के बहुमूल्य फलों के पौधे भी तैयार कर चुके हैं ।स्थानीय महिलाओं के श्रम के बोझ को कम करने के लिए और उन्हें आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए गोबर की मूर्तियां, दिए आदि बनाने का प्रशिक्षण दिया और तैयार सामग्री को ग्राहकों तक भेज कर आर्थिक स्वावलम्बन के अवसर भी पैदा किये हैं। हरीश का कहना है कि मैं गावँ सिर्फ बच्चो की स्कूल की छुट्टी के कारण आया था और यह सब मैंने शुरू में शौकिया किया लेकिन सफलता मिलने के कारण अब वापस जाने का मन नहीं करता , केसर की क्यारियां उत्तराखण्ड को इक्कीसवीं शताब्दी का समर्थ राज्य बनाने में सक्षम हैं। अभी बीज किश्तवाड़ कश्मीर से मंगवाना पड़ता है जो कि काफी महंगा पड़ता है,सरकार दिलचस्पी ले और अनुदान में किसानों को बीज मिल सके तो केसर की खेती में हम कश्मीर को भी पीछे छोड़ सकते हैं। उत्तराखंड में समेकित और समावेशित  खेती  का भविष्य उज्ज्वल है, सूचना तकनीक और डिजिटल इंडिया ने विपणन के रास्ते सरल किये है,अपने भीतर कृषक उद्यमी का भाव जगाकर हम अपने पूर्वजों के सपने के उत्तराखण्ड की कल्पना सार्थक कर पाएंगे। आज हरीश ने स्वयं तो अपने खेतों में सफलता पूर्वक केसर पुष्पित पल्लवित किया ही है साथ ही गावँ के अन्य काश्तकारों को भी केसर के पौध उपलब्ध करवाकर उन्नत खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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