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बरेली दंगा मामला: इंस्पेक्टर के हाथ काटने की धमकी देने वाले डॉ. नफीस की सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी खारिज

26 सितंबर 2025 के बरेली दंगा मामले में हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं; एसएसपी अनुराग आर्य के निर्देशन में क्षेत्राधिकारी प्रथम आशुतोष शिवम और कैंट इंस्पेक्टर संजय कुमार धीर की अभियोजन संबंधी तैयारियों में अहम भूमिका*

26 सितंबर 2025 को बरेली में हुए दंगों से जुड़े मामलों में आरोपी और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के पूर्व प्रवक्ता डॉ. नफीस अहमद की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज हो गई है। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी उनकी जमानत अर्जियां खारिज कर दी थीं। शीर्ष अदालत से राहत नहीं मिलने के बाद डॉ. नफीस की कानूनी मुश्किलें बरकरार हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध नहीं होने के कारण फैसले के विस्तृत आधार की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।

डॉ. नफीस वही आईएमसी नेता हैं, जिनका सितंबर 2025 में किला थाना प्रभारी सुभाष कुमार के हाथ काटने और वर्दी उतरवाने की कथित धमकी देने संबंधी वीडियो वायरल हुआ था। इस मामले में पुलिस ने उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया था।

दंगे से पांच दिन पहले इंस्पेक्टर को दी थी धमकी

21 सितंबर 2025 को बरेली के किला क्षेत्र में ‘आई लव मोहम्मद’ लिखे पोस्टर और बैनर हटाने को लेकर विवाद हुआ था। तत्कालीन किला थाना प्रभारी सुभाष कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे थे।

इसी दौरान डॉ. नफीस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें इंस्पेक्टर के हाथ काटने और वर्दी उतरवाने की कथित धमकी सामने आई थी। पुलिस ने वीडियो का संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज किया था।

हालांकि, डॉ. नफीस ने सफाई दी थी कि हाथ काटने संबंधी टिप्पणी पुलिस के मुखबिरों को लेकर की गई थी।

हाईकोर्ट से तीन मुकदमों में खारिज हुई थी जमानत

बरेली हिंसा से जुड़े कोतवाली थाने में दर्ज अपराध संख्या 502, 492 और 489 के मामलों में डॉ. नफीस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत अर्जियां दाखिल की थीं।

सात सितंबर 2026 को हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जमानत देने से इनकार कर दिया था। अभियोजन की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता नितेश श्रीवास्तव ने सरकार का पक्ष रखा था।

एसएसपी अनुराग आर्य के निर्देशन में पुलिस की प्रभावी पैरवी

बरेली दंगा मामलों में एसएसपी अनुराग आर्य के निर्देशन में पुलिस की ओर से अभियोजन संबंधी तैयारियों और न्यायिक पैरवी के समन्वय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्षेत्राधिकारी प्रथम आशुतोष शिवम और थाना कैंट प्रभारी निरीक्षक संजय कुमार धीर की भूमिका भी अहम बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में संबंधित मामलों की पैरवी के लिए केस डायरी, विवेचना संबंधी अभिलेखों, साक्ष्यों और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के समन्वय में पुलिस अधिकारियों ने सक्रिय भूमिका निभाई है।

विशेष रूप से इंस्पेक्टर संजय कुमार धीर दंगा मामलों की शुरुआती न्यायिक कार्यवाही से लेकर उच्च न्यायालयों में अभियोजन संबंधी तैयारियों से जुड़े रहे हैं। न्यायालयों में औपचारिक पैरवी सरकारी अधिवक्ताओं द्वारा की जाती है।

26 सितंबर को बरेली में भड़की थी हिंसा

26 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद बरेली में तनावपूर्ण हालात पैदा हो गए थे। कई स्थानों पर पुलिस और भीड़ के बीच टकराव, पथराव तथा हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं।

पुलिस ने विभिन्न थाना क्षेत्रों में मुकदमे दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। आईएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खान और उनके करीबियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की गई।

संपत्तियों पर भी हुई थी कार्रवाई

बरेली हिंसा के बाद प्रशासन ने डॉ. नफीस से जुड़ी संपत्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई की थी। नावल्टी चौराहे स्थित मार्केट सील किए जाने और जखीरा क्षेत्र में रजा पैलेस को अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्त किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

इसके अतिरिक्त वक्फ संपत्ति से जुड़े एक अलग मामले में भी दोबारा जांच के निर्देश दिए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, कानूनी मुश्किलें बरकरार

हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी खारिज होने से डॉ. नफीस को अपेक्षित राहत नहीं मिली है। इस मामले में एसएसपी अनुराग आर्य, क्षेत्राधिकारी प्रथम आशुतोष शिवम और इंस्पेक्टर संजय कुमार धीर के स्तर पर अभियोजन की तैयारियों एवं समन्वय की भूमिका भी चर्चा में है।

हालांकि, जमानत अथवा एसएलपी खारिज होना दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। मुकदमों में आरोपों का अंतिम निर्णय न्यायालय साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर करेगा।

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