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18 घंटे की बारिश ने खोल दी ‘स्मार्ट सिटी’ के दावों की पोल, मेयर उमेश गौतम पर उठे सवाल—करोड़ों खर्च के बाद भी पानी में क्यों डूबा बरेली?

बरेली। लंबे समय तक हुई बारिश ने बरेली में विकास और जल निकासी के दावों को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। रविवार को हुई मूसलाधार बारिश के बाद शहर के पॉश इलाकों से लेकर प्रमुख बाजारों और सड़कों तक जलभराव दिखाई दिया। कई स्थानों पर सड़कों ने तालाब जैसी शक्ल ले ली। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल नगर निगम और मेयर उमेश गौतम से पूछा जा रहा है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर की बुनियादी जल निकासी व्यवस्था आखिर क्यों नहीं सुधरी?

6 सितंबर को हुई बारिश के बाद दरगाह आला हजरत मोड़ समेत शहर के कई इलाकों में घुटनों तक पानी भरने की स्थिति सामने आई। मीडिया रिपोर्टों में भी इसे नगर निगम की जल निकासी व्यवस्था के दावों की परीक्षा बताया गया। सवाल इसलिए और गंभीर है क्योंकि बरेली स्मार्ट सिटी के आधिकारिक रिकॉर्ड में सड़कों के साथ नालियों और ड्रेनेज निर्माण को महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।

करोड़ों की स्मार्ट सड़कें, फिर भी जलभराव क्यों?

बरेली स्मार्ट सिटी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार मेजर रोड फेज-1, फेज-2 और फेज-3 में सड़क निर्माण के साथ ड्रेन, स्मार्ट रोड और जंक्शन डेवलपमेंट जैसे काम शामिल थे। इंटरनल रोड फेज-1 के तहत भी 11.2 किलोमीटर सड़कों के साथ ड्रेन, फुटपाथ और अन्य सुविधाओं के निर्माण का दावा किया गया है।

इसके बावजूद सड़कों पर पानी जमा होना नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं की योजना, गुणवत्ता और रखरखाव पर सवाल खड़े करता है।

जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्ट सिटी की मेजर रोड फेज-1 और फेज-3 पर कुल करीब 129.52 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन बाद में सड़क और फुटपाथ में कई खामियां सामने आईं। अधिकारियों की ओर से निर्माण एजेंसी को नोटिस दिए जाने की बात भी सामने आई थी।

स्मार्ट सिटी का प्रस्ताव ही था करीब 1,903 करोड़ रुपये का

बरेली के शुरुआती स्मार्ट सिटी प्रस्ताव की अनुमानित लागत करीब 1,902.77 करोड़ रुपये बताई गई थी। इसमें एरिया बेस्ड डेवलपमेंट और पैन-सिटी परियोजनाओं पर बड़ी धनराशि खर्च करने की योजना थी। प्रस्ताव में स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज भी महत्वपूर्ण हिस्सा था।

ऐसे में जनता का सवाल सीधा है—जब योजनाओं में ड्रेनेज था, सड़कों के साथ नालियां बनाई गईं और करोड़ों रुपये खर्च हुए तो भारी बारिश होते ही शहर की सड़कें पानी में क्यों डूब जाती हैं?

तालाबों पर कब्जे के आरोपों ने बढ़ाए सवाल

शहर के तालाबों और जलमग्न भूमि की स्थिति भी लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है। तालाब केवल जमीन का खाली हिस्सा नहीं होते, बल्कि बारिश के पानी को संग्रहित करने और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे प्राकृतिक जलस्रोतों पर अतिक्रमण या उनका क्षेत्रफल कम होने से शहरी जल निकासी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

इसलिए शहर में तालाबों पर कथित कब्जों की शिकायतों और मौजूदा जलभराव को देखते हुए यह जांच का विषय है कि कितने पुराने तालाब आज अपने मूल स्वरूप में मौजूद हैं, कितनों पर अतिक्रमण है और नगर निगम ने उन्हें संरक्षित करने के लिए क्या कार्रवाई की।

मेयर उमेश गौतम से जवाब मांग रही जनता

मेयर उमेश गौतम के कार्यकाल में स्मार्ट सिटी के तहत कई बड़े प्रोजेक्ट सामने आए, लेकिन बारिश के बाद शहर की तस्वीर विकास के इन दावों पर सवाल खड़ी कर रही है। मुद्दा केवल यह नहीं है कि कितने करोड़ रुपये खर्च किए गए, बल्कि यह है कि उस खर्च का आम नागरिक को वास्तविक लाभ कितना मिला।

अगर करोड़ों की सड़क बारिश में बदहाल हो जाए, नालियां पानी न निकाल पाएं और प्रमुख इलाके जलमग्न हो जाएं तो नगर निगम को परियोजनाओं की जवाबदेही तय करनी होगी।

अब सवाल मेयर और नगर निगम से है—स्मार्ट सिटी के नाम पर हुए करोड़ों रुपये के खर्च के बाद भी बरेली को बेहतर सड़कें और प्रभावी जल निकासी व्यवस्था क्यों नहीं मिल सकी? और अगर पुराने तालाब शहर के प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम का हिस्सा थे, तो उनके संरक्षण की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?

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