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कब सबक लेगी दिल्ली? लगातार ढह रहीं इमारतें, एक साल में 6 बड़े हादसों ने ली 35 जानें…

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में जर्जर और निर्माणाधीन इमारतों के ढहने का सिलसिला लगातार चिंता बढ़ा रहा है। पिछले करीब एक साल में हुए छह बड़े हादसों में लगभग 35 लोगों की जान जा चुकी है। हर घटना के बाद जांच, कार्रवाई और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की बातें सामने आती हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर वही तस्वीर दिखाई देती है।

सबसे ताजा मामला दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन का है, जहां रविवार को छात्रों के लिए इस्तेमाल हो रही पांच मंजिला पीजी इमारत अचानक ढह गई। हादसे में अब तक छह लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि कई लोगों को मलबे से सुरक्षित बाहर निकाला गया। राहत और बचाव अभियान जारी रहा।

रिपोर्टों के अनुसार, इमारत काफी पुरानी थी और बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था। इस हादसे ने राजधानी में पुराने भवनों, अनधिकृत निर्माण और इमारतों की सुरक्षा जांच को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक साल में हादसों की लंबी फेहरिस्त

सत्य निकेतन की घटना से पहले जुलाई 2026 में रोहिणी में निर्माणाधीन इमारत गिरने से तीन मजदूरों की मौत हुई थी। मई में साकेत क्षेत्र में पांच मंजिला इमारत गिरने से छह लोगों की जान गई थी। इसके अलावा वेलकम, पहाड़गंज और मुस्तफाबाद में भी इमारत गिरने की घटनाओं में कई लोगों की मौत हुई।

इन घटनाओं में एक समान सवाल बार-बार सामने आता है—क्या समय रहते खतरनाक इमारतों की पहचान और कार्रवाई नहीं की जा सकती?

कार्रवाई सिर्फ हादसे के बाद क्यों?

इमारत गिरने के बाद एजेंसियां मौके पर पहुंचती हैं, जांच के आदेश दिए जाते हैं और दोषियों पर कार्रवाई की बात होती है। लेकिन असली चुनौती हादसे से पहले खतरे को पहचानने की है।

दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में पुराने भवनों, अवैध निर्माण और कमजोर ढांचों की नियमित जांच बेहद जरूरी है। खासकर उन इलाकों में जहां बड़ी संख्या में छात्र, मजदूर और परिवार ऐसी इमारतों में रहते हैं।

सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं

लगातार हो रहे हादसे यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या राजधानी की मौजूदा बिल्डिंग सेफ्टी व्यवस्था पर्याप्त है? अगर किसी इमारत में अवैध निर्माण या संरचनात्मक कमजोरी पहले से मौजूद है, तो उसकी पहचान हादसे के बाद क्यों होती है?

सत्य निकेतन हादसे के बाद एक बार फिर दिल्ली की इमारतों की सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी पर बहस तेज हो गई है। अब देखना होगा कि इस बार जांच और कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या राजधानी में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था भी बनाई जाती है।

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