बरेली। बिथरी चैनपुर थाने में युवक अनिल के गंभीर रूप से घायल होने से जुड़े बहुचर्चित मामले ने अब नया और महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ ले लिया है। विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट, बरेली की अदालत ने 7 अक्टूबर 2026 को पुलिस को मामले में उचित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर विवेचना करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट सात दिन के भीतर प्रस्तुत करने के लिए भी कहा है। शिकायत में बिथरी चैनपुर के तत्कालीन थाना प्रभारी राजेश बाबू मिश्रा समेत अन्य पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे।
यह मामला जुलाई 2026 का है। उस समय बिथरी चैनपुर थाना क्षेत्र निवासी अनिल को एक महिला की शिकायत के बाद यूपी-112 पुलिस थाने लेकर पहुंची थी। इसके बाद थाने के भीतर अनिल का हाथ गंभीर रूप से घायल हो गया था। हालत बिगड़ने पर उसे निजी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। सार्वजनिक रिपोर्टों के मुताबिक अत्यधिक रक्तस्राव के बाद अनिल की हालत गंभीर हो गई थी और उसे चिकित्सकीय उपचार के साथ CPR दिए जाने की बात भी सामने आई थी। उसके हाथ के एक से अधिक ऑपरेशन होने की जानकारी भी प्रकाशित हुई थी।
परिवार ने लगाया था थाने में मारपीट का आरोप
अनिल के परिजनों ने शुरू से आरोप लगाया था कि थाने में उसके साथ मारपीट की गई और उसे ऐसे स्थान पर रखा गया, जहां CCTV कैमरे की कवरेज नहीं थी। परिजनों के आरोपों के बाद मामला पुलिस अधिकारियों तक पहुंचा और सीओ हाईवे देवेश सिंह की ओर से जांच किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
उस समय की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच में थाने की जनरल डायरी यानी GD, CCTV कैमरों और तत्कालीन थाना प्रभारी की मौजूदगी संबंधी तथ्यों को खंगाला जा रहा था। तत्कालीन SHO राजेश बाबू मिश्रा की ओर से जांच अधिकारियों को यह बताया गया था कि घटना के समय वह थाने पर मौजूद नहीं थे। इसके बाद उनकी मौजूदगी की पुष्टि के लिए GD, CCTV और मोबाइल लोकेशन तक जांचे जाने की बात सामने आई थी।
पुलिस का पक्ष था—खुद शीशे पर मारा हाथ
दूसरी ओर पुलिस ने उस समय परिवार की ओर से लगाए गए मारपीट के आरोपों से इनकार किया था। पुलिस अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया था कि अनिल कथित रूप से नशे की हालत में था और पूछताछ के दौरान उसने स्वयं शीशे के गेट पर हाथ मारा, जिससे शीशा टूटने के बाद उसका हाथ गंभीर रूप से घायल हो गया। एसपी उत्तरी मुकेश चंद्र मिश्रा के हवाले से भी यही प्रारंभिक पुलिस पक्ष प्रकाशित हुआ था।
इसी विरोधाभास—परिवार के मारपीट के आरोप और पुलिस के स्वयं चोट लगने के दावे—के चलते यह मामला शुरू से सवालों के घेरे में रहा।
अब अदालत के आदेश से जांच का दायरा बढ़ने की संभावना
अब विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट की अदालत द्वारा एफआईआर दर्ज कर विवेचना के निर्देश दिए जाने के बाद मामले में पुलिस की भूमिका से जुड़े आरोप औपचारिक आपराधिक जांच के दायरे में आ सकते हैं। जांच में यह अहम होगा कि घटना के समय थाने में कौन-कौन पुलिसकर्मी मौजूद थे, अनिल को किस स्थान पर रखा गया था और वहां CCTV कैमरों की वास्तविक स्थिति क्या थी।
इसके साथ ही थाने की GD, ड्यूटी रजिस्टर, संभावित CCTV फुटेज, पुलिसकर्मियों की मोबाइल लोकेशन, अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन से संबंधित दस्तावेज और डॉक्टरों की रिपोर्ट अहम साक्ष्य बन सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी रहेगा कि अनिल को लगी चोट वास्तव में किस परिस्थिति में आई—क्या वह पुलिस के दावे के मुताबिक स्वयं शीशा तोड़ने से घायल हुआ था, या परिवार की शिकायत के मुताबिक उसके साथ कथित मारपीट हुई थी।
अदालत का आदेश आरोपों को सिद्ध नहीं करता, बल्कि एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष विवेचना का रास्ता खोलता है। अब विवेचना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही यह तय होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है और संबंधित पुलिसकर्मियों की कोई आपराधिक जिम्मेदारी बनती है या नहीं।





