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सनातनियों को हथियार के लाइसेंस क्यों बांट रहे असम के मुख्यमंत्री? क्या कानून…..

सम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हालिया फैसले ने सियासी बहस को गर्मा दिया है। उन्होंने राज्य के संवेदनशील इलाकों में रहने वाले “मूल निवासियों” को हथियार के लाइसेंस देने की घोषणा की है। इस पहल के पीछे सरकार का दावा है कि यह केवल “आत्मरक्षा” और “कानूनी सुरक्षा” के दायरे में किया जा रहा कदम है, लेकिन विपक्ष इसे “राजनीतिक एजेंडा” करार दे रहा है।

सरकार की दलील — सुरक्षा का अधिकार

मुख्यमंत्री का कहना है कि सीमावर्ती और संवेदनशील जिलों में कई परिवार लगातार असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में कानून व्यवस्था की चुनौतियां और सीमाई घुसपैठ के खतरे भी मौजूद हैं। सरकार का मानना है कि वैध हथियार रखने से लोग न सिर्फ अपनी सुरक्षा बेहतर कर पाएंगे बल्कि अपराधियों में भी डर बना रहेगा।

कैसे मिलेगा लाइसेंस?

आवेदन केवल असम के मूल निवासियों के लिए खुलेगा

उम्र, पृष्ठभूमि और स्वास्थ्य की कड़ी जांच होगी

पुलिस और प्रशासन दोनों स्तर पर वेरिफिकेशन अनिवार्य

लाइसेंस का गैर-हस्तांतरण और नियमित समीक्षा की व्यवस्था

इसके लिए राज्य एक ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च करने जा रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और ट्रैक की जा सके।

क्या कानून में इजाज़त है?

भारतीय आर्म्स एक्ट, 1959 और आर्म्स नियम, 2016 के तहत, कोई भी भारतीय नागरिक यदि आत्मरक्षा या संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यकता सिद्ध कर दे, तो लाइसेंस प्राप्त कर सकता है। इसके लिए स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस की मंजूरी जरूरी होती है। असम सरकार ने भी यही कानूनी ढांचा अपनाया है।

विपक्ष का विरोध

कांग्रेस और अन्य दलों का आरोप है कि सरकार यह फैसला “ध्रुवीकरण” के इरादे से कर रही है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। उनका कहना है कि सुरक्षा का जिम्मा प्रशासन और पुलिस का होना चाहिए, न कि आम नागरिक के हाथ में हथियार सौंपना।

असम का यह कदम एक ओर स्थानीय निवासियों को आत्मरक्षा का कानूनी साधन देने की कोशिश है, तो दूसरी ओर यह राज्य की राजनीति में नया विवाद भी खड़ा कर रहा है। असल परीक्षा तब होगी जब इस योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और नियमों की सख्ती वास्तव में जमीन पर दिखेगी।सनातनियों को हथियार के लाइसेंस क्यों बांट रहे असम के मुख्यमंत्री? क्या कानून…..

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