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अल्लाह (ईश्वर) और इंसान के बारे में इस्लाम और हिन्दू दर्शन में क्या व्याख्या है

  1. ईश्वर अद्वितीय और बेमिसाल है

इस्लाम (क़ुरआन)

क़ुरआन (42:11) — “उसके जैसा कोई नहीं, और वही सब कुछ सुनने वाला और देखने वाला है।”

क़ुरआन (112:1-4) — “कहो: वह अल्लाह है, एक। अल्लाह बेनियाज़ है। न वह जन्म देता है, न जन्म लिया गया है। और न कोई उसका समकक्ष है।”

हिन्दू शास्त्र

श्वेताश्वतर उपनिषद 6:8 — “वह एक है, दूसरा कोई नहीं; उसका कोई समान नहीं।”

यजुर्वेद 32:3 — “उसकी कोई मूर्ति नहीं, वह अजन्मा है, पवित्र है, दोष रहित है।”

समानता: दोनों मानते हैं कि परमात्मा एक है, उसका कोई जोड़ा नहीं।

  1. ईश्वर सृष्टिकर्ता है, मनुष्य उसकी सृष्टि

इस्लाम (क़ुरआन)

क़ुरआन (39:62) — “अल्लाह ही सब चीज़ों का पैदा करने वाला है, और वही हर चीज़ का मालिक है।”

क़ुरआन (16:17) — “क्या जो पैदा करता है, वह उस जैसा हो सकता है जो पैदा नहीं करता? क्या तुम नहीं सोचते?”

हिन्दू शास्त्र

श्वेताश्वतर उपनिषद 6:13 — “दो अस्तित्व हैं: जीवात्मा (व्यक्तिगत आत्मा) और ईश्वर (परमात्मा)। ईश्वर, जीव को नियंत्रित करता है।”

भगवद गीता 15:7 — “यह शाश्वत जीव इस संसार में मेरा अंश है।” (यहाँ ‘अंश’ का अर्थ है ईश्वर पर निर्भर, न कि बराबर।)

समानता: दोनों में ईश्वर सृष्टिकर्ता है और जीव उसकी रचना है, बराबरी का नहीं।

  1. भक्ति और सेवक भाव

इस्लाम (क़ुरआन)

क़ुरआन (51:56) — “मैंने जिन्न और इंसान को सिर्फ अपनी इबादत के लिए पैदा किया।”

क़ुरआन (1:5) — “हम सिर्फ तेरी इबादत करते हैं और सिर्फ तुझी से मदद मांगते हैं।”

हिन्दू शास्त्र

भगवद गीता 18:66 — “सब धर्म छोड़कर सिर्फ मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा।”

ऋग्वेद 1.164.46 — “उसे इंद्र, मित्र, वरुण कहते हैं… लेकिन सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नाम से पुकारते हैं।”

समानता: दोनों में ईश्वर ही उपासना के योग्य है, और मनुष्य उसका सेवक है।

  1. अंतिम मिलन / मुक्ति

इस्लाम (क़ुरआन)

क़ुरआन (84:6) — “ऐ इंसान! तू अपने रब की ओर मेहनत करता हुआ बढ़ रहा है, और उससे मिलेगा।” (मिलना = रब को देखना/सामना करना, रब बनना नहीं।)

क़ुरआन (10:26) — “जो भलाई करेंगे, उनके लिए सबसे अच्छा (जन्नत) और उससे भी बढ़कर (अल्लाह का दीदार) होगा।”

हिन्दू शास्त्र

द्वैत वेदांत (माध्वाचार्य) — मुक्ति = परमात्मा के धाम में अनंत सेवा, लेकिन ईश्वर में विलय नहीं।

भगवद गीता 15:6 — “मेरा परम धाम सूर्य या चंद्र से प्रकाशित नहीं होता… वहाँ पहुँचकर जीव फिर वापस नहीं आता।”

समानता: ईश्वर के पास रहना ही मुक्ति है, लेकिन ईश्वर और जीव एक नहीं होते।

  1. अनेक देवताओं का इनकार – ईश्वर और मनुष्य की समानता का खंडन

इस्लाम (क़ुरआन)

क़ुरआन (21:22) — “अगर अल्लाह के अलावा और भी ईश्वर होते, तो आसमान और ज़मीन बिगड़ जाते।”

क़ुरआन (25:3) — “उन्होंने अल्लाह के अलावा ऐसे ईश्वर बना लिए जो कुछ पैदा नहीं करते, बल्कि खुद पैदा किए गए हैं।”

हिन्दू शास्त्र

श्वेताश्वतर उपनिषद 6:13 — “परमात्मा जीव को नियंत्रित करता है।” (नियंत्रण = अंतर है।)

द्वैत दर्शन — जीव और ईश्वर में सदा भेद है।

समानता: ईश्वर अद्वितीय है और सृष्टि में किसी के बराबर नहीं।

मुख्य अंतर

इस्लाम: कभी भी जीव और ईश्वर एक नहीं हो सकते। “मैं ईश्वर हूँ” जैसी सोच (अहं ब्रह्मास्मि) को शिर्क माना जाता है।

हिन्दू दर्शन:

द्वैत और विशिष्ट अद्वैत — ईश्वर और जीव अलग, लेकिन जीव हमेशा ईश्वर पर निर्भर।

अद्वैत — जीव और ईश्वर मूलतः एक ही हैं, अंतर माया है (यह इस्लामी दृष्टि में ग़लत)।

आदरणीय शंकराचार्य जी,
आदाब,

आपसे गुजारिश है कि इस सम्बन्ध में इस धार्मिक व्याख्या पर अपनी सहमति प्रदान करने की कृपा करे। ताकि अंत धार्मिक असहमतियों पर विराम लग सके और आपसी विश्वास और प्रेम कायम हो सके।

खुर्शीद अहमद सिद्दीकी,
37, प्रीति एनक्लेव, माजरा,
देहरादून, (उत्तराखंड)

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