भारतीय मुसलमानों की कयादत का एक बड़ा हिस्सा आज उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुका है जहाँ सक्रिय संघर्ष और ज़मीनी नेतृत्व की जगह, अपने-अपने दायरों और हितों की हिफाज़त अधिक दिखाई देती है। बहुत से मज़हबी रहनुमा अपने-अपने गोशों में महदूद हैं और उन अमलाक व इदारों को बचाने में मशगूल हैं, जो अक्सर अवामी सहयोग और चंदे से खड़े हुए हैं। हक़ को हक़ कहने की ज़रूरत जब सामने आती है तो आवाज़ अक्सर बंद कमरों तक सिमट जाती है और उसमें भी इतनी मसलहत शामिल होती है कि कहीं कोई सवाल, पूछताछ या परेशानी खड़ी न हो जाए।
सियासी रहनुमा भी इससे पूरी तरह अलग दिखाई नहीं देते। बहुतों की कोशिश सत्ता के गलियारों तक पहुँचने, संसद या विधानसभा की कुर्सी हासिल करने और अपने राजनीतिक व निजी प्रभाव को बनाए रखने तक सीमित होती दिखाई देती है। कोई खुद सत्ता में पहुँचना चाहता है, कोई अपने बेटे-बेटी को उसी रास्ते पर देखना चाहता है। सत्ता का नशा ऐसा है कि उतरने का नाम ही नहीं लेता।
मेरा सवाल किसी एक पार्टी, एक व्यक्ति या एक समुदाय से नहीं है। सवाल पूरी कयादत से है।
आज संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या सीमित है और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के समाज से बड़ी संख्या में प्रतिनिधि मौजूद हैं। फिर भी जब इन समाजों के घरों, इबादतगाहों, मदरसों और अधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल सामने आते हैं, तो क्या संसद के भीतर उनकी आवाज़ उतनी मजबूती से उठती है, जितनी उठनी चाहिए?
अगर किसी नागरिक का घर टूटता है, किसी मस्जिद या मदरसे पर कार्रवाई होती है, किसी दलित बेटी के साथ अन्याय होता है या किसी कमजोर वर्ग के अधिकार कुचले जाते हैं, तो क्या केवल सोशल मीडिया पर बयान देना पर्याप्त है?
लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिया था। वह राजनीति में जवाबदेही की एक मिसाल मानी जाती है।
आज सवाल यह है कि क्या हमारी राजनीति में जवाबदेही का वह एहसास अभी बाकी है?
जब आपके अपने समाज के लोग आपको पुकार रहे हों, जब उनके घरों और इबादतगाहों से जुड़े गंभीर सवाल सामने हों, जब लोग अपने आपको बेआसरा महसूस कर रहे हों, तब जनप्रतिनिधि की कुर्सी का औचित्य क्या है?
अगर किसी जनप्रतिनिधि को हिरासत में ले लिया जाए, उसकी आवाज़ सीमित कर दी जाए और उसके सामने उसके क्षेत्र के लोगों के अधिकारों से जुड़े गंभीर मामले उठते रहें, तो उसे संसद और विधानसभाओं में अपनी मौजूदगी के मायने पर भी आत्ममंथन करना चाहिए।
रहबरान-ए-मिल्लत से भी सवाल
इसी तरह हमारे मज़हबी रहनुमाओं से भी कुछ सवाल हैं।
मिम्बरों से अमर बिल मारूफ़ की सदाएँ तो बहुत सुनाई देती हैं, लेकिन आज के हालात में नही अनिल मुनकर की वह आवाज़ कब बुलंद होगी जिसकी तालीम हमें कुरआन, हदीस और सीरत-ए-नबी ﷺ से मिलती है?
नौजवान नस्ल को आज सिर्फ भाषणों की नहीं, बल्कि सही शरई रहनुमाई, किरदार, हक़गोई और अमल की ज़रूरत है। अगर उन्हें यह रहनुमाई अपने रहबरों से नहीं मिलेगी, तो उनके भीतर पैदा होने वाला बेचैनी और असंतोष गलत दिशाओं में भी जा सकता है।
इसलिए ज़रूरत है कि रहबरान-ए-मिल्लत नौजवानों के बीच आएँ, उनके सवाल सुनें और कुरआन व हदीस की रोशनी में उन्हें सही रास्ता दिखाएँ।
और एक सवाल उन तमाम तंजीमों से भी है जो अवामी चंदे और सहयोग से चलती हैं:
हर साल मुकदमेबाज़ी और दूसरे खर्चों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, तो उसका हिसाब अवाम को कब दिया जाएगा?
जो माल जनता ने भरोसे के साथ दिया है, उसका हिसाब जनता के सामने होना चाहिए। क्योंकि दुनिया की अदालत से बच निकलना संभव हो सकता है, लेकिन अल्लाह तआला की अदालत से कोई नहीं बच सकता।
आज वक्त सिर्फ दूसरों पर उंगली उठाने का नहीं, बल्कि अपना भी हिसाब करने का है।
सियासी रहनुमा अपने ज़मीर से सवाल करें।
मज़हबी रहनुमा अपने मिम्बर से सवाल करें।
तंजीमें अपने हिसाब-किताब से सवाल करें।
और जनप्रतिनिधि अपनी ज़िम्मेदारी से सवाल करें।
क्योंकि कयादत सिर्फ कुर्सी का नाम नहीं है।
कयादत अमानत है, जवाबदेही है और ज़रूरत पड़ने पर हक़ के साथ खड़े होने का नाम है।
खुर्शीद अहमद सिद्दीकी
ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा ﷺ





