अज़ीज़ अहमद सिद्दीक़ी पुरकाजी मुजफ्फरनगर
कहने का तात्पर्य यह है कि आज के समय में रिश्तों में गिरावट बहुत तेज़ी से आती जा रही है जिसके ज़िम्मेदार हम सभी लोग है जी हा हम सभी है?
कैसे…
बताता हू….
जब एक माता पिता अपने बच्चो को जन्म से ही अच्छी परवरिश देते है धीरे धीरे बच्चे बड़े होते जाते है तो माता पिता बच्चों के नखरे उनकी जिद, उनकी ख्वाहिशे पूरी करते रहते है एक मां अपने बच्चो को गीले स्थान पर नहीं सोने देती खुद गिले स्थान पर सो जाती है ताकि बच्चों को कोई परेशानी ना हो, एक पिता दिन भर मजदूरी या अपना व्यवसाय करके थककर शाम को घर पहुंचता है ताकि बच्चों की अच्छी परवरिश की जा सके।
इस माता पिता के बलिदान को दिल की गहराइयों से समझना और महसूस करना चाहिए।
जब हम यह महसूस करेंगे तो एक अच्छे फरमाबरदार औलाद कहलाएंगे।
वही आज के इस कलयुग में बच्चे अपने माता पिता से बदतमीजी से बोलना, गुस्सा करना, लड़ाई झगड़े करना यह सब आम बात हो गई है
सभी धर्मों में माता पिता का दर्जा बुलंद रखा गया है। एक शब्द है उफ़, इस्लाम मज़हब में अपने माता पिता को उफ़ कहना भी मना किया गया है। जब सभी धर्मों में माता पिता की सेवा करना बताया तो आज उन बातों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है। मेरी आप सभी बच्चों से निवेदन करता हू कि अपने बड़ों का सम्मान जरूर करे। कम कहने को ज्यादा समझे।
अब बात आती है बड़ों का बड़ा होने वाली बात का
आज कल यह भी देखने को मिल रहा है कि कुछ माता पिता अपने बच्चो के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे है। जिससे रिश्तों मे दरार पैदा होती जा रही है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम का बोझ, आर्थिक तंगी और निजी समस्याएं माता-पिता के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं। अक्सर वे अपनी हताशा या गुस्सा अनजाने में बच्चों पर निकाल देते हैं।
बदलते दौर और विचारों का अंतर डिजिटल युग के कारण बच्चों की सोच, ज़रूरतें और जीवनशैली बहुत तेज़ी से बदली हैं। कई बार माता-पिता पुरानी सोच या अपनी अपेक्षाओं को बच्चों पर थोपते हैं, और जब बच्चे उनके अनुसार नहीं चलते, तो टकराव शुरू हो जाता है। कई बार माता-पिता अनुशासन के नाम पर अत्यधिक सख्ती, मार-पीट या डांट-फटकार को सही मानते हैं, जबकि आज के दौर में यह तरीका बच्चों के मन में डर, हीनभावना और दूरी पैदा करता है। बच्चों की तुलना दूसरों से करना या उन पर अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने का दबाव बनाना भी एक तरह का मानसिक उत्पीड़न बन जाता है। परिवार में एक-दूसरे की बात को ध्यान और धैर्य से सुनने की आदत कम हो रही है, जिससे छोटी-छोटी बातें बड़े विवादों का रूप ले लेती हैं। माता-पिता को बच्चों के साथ दोस्ताना माहौल बनाना चाहिए ताकि वे अपनी बात बिना डरे कह सकें। तनाव की स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय थोड़ा समय लेना बेहतर होता है।
बच्चों की उम्र और उनकी मानसिक स्थिति को समझकर उनकी बात सुनना बहुत ज़रूरी है।
बस यही अपने विचार आप सभी से शेयर कर रहा हू सभी माता पिता और बच्चे दोनों ही इस बात पर ध्यान दे और अपने रिश्तों को सुधारने की कोशिश करे।






