मध्य-पूर्व में तनाव एक बार फिर चरम पर है। इस्राइल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान को सीधे चुनौती दी है। सवाल यह है कि आखिर कब-कौन सी जगहें निशाने पर आईं और इन हमलों का मकसद क्या था? आइए समझते हैं 5 अहम बिंदुओं में।
शीर्ष नेतृत्व से जुड़े परिसरों पर दबाव
हमलों के शुरुआती दौर में सुरक्षा एजेंसियों से जुड़ी उन इमारतों और परिसरों को निशाना बनाया गया, जो सीधे तौर पर ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई के सुरक्षा तंत्र से जुड़े बताए जाते हैं। इन कार्रवाइयों का मकसद रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना माना जा रहा है।
रिवोल्यूशनरी गार्ड के ठिकाने
ईरान की ताकतवर सैन्य इकाई Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के कमांड सेंटर और हथियार भंडार पर सटीक हमले किए गए। दावा है कि ड्रोन और मिसाइल तकनीक से जुड़े कई ठिकाने प्रभावित हुए।
परमाणु कार्यक्रम से जुड़े केंद्र
इस्राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता रहा है। हालिया हमलों में उन शोध और संवर्धन केंद्रों को निशाना बनाए जाने की खबरें हैं, जिन पर परमाणु गतिविधियों से जुड़ा होने का आरोप है। हालांकि ईरान ने बड़े नुकसान से इनकार किया है।
सीरिया-इराक सीमा के सैन्य ठिकाने
ईरान समर्थित मिलिशिया और हथियार आपूर्ति मार्गों को तोड़ने के लिए सीरिया और इराक की सीमा पर मौजूद सैन्य ठिकानों पर भी कार्रवाई हुई। इन हमलों का मकसद क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करना बताया जा रहा है।
जवाबी कार्रवाई और वैश्विक असर
ईरान ने जवाबी हमलों की चेतावनी दी है। अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इस्राइली शहरों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों ने संयम बरतने की अपील की है। आशंका है कि अगर तनाव बढ़ा तो इसका असर पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
इस्राइल-अमेरिका की यह संयुक्त रणनीति सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। अब नजर इस बात पर है कि ईरान अगला कदम क्या उठाता है कूटनीति या सीधा मुकाबला?






