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हरेला की हरियाली या दिखावे की खेती?

उत्तराखंड में हरेला पर हर साल लाखों पौधे लगाए जाते हैं और हर साल उत्तराखंड को हरियाली में लपेटने, पर्यावरण मुक्त करने, नदियों को पुनः जीवित करने और हिमालय को बचाने की क़स्मे खाई जाती हैं मगर हर साल की दशा अगले साल दुर्दशा बन जाती हैं लाखों पौधे लगाने के पश्चात शायद सैकड़ों पौधे भी जीवित नहीं बचते हैं और ना ही सरकार, ना ही संस्थाएं जो इस तरह के प्रोग्राम चलाती हैं साल भर उन पौधों की सुध लेती हैं कि जो पौधे लगाए थे जिंदा बचे या मर गए या लोगों ने उखाड़ कर अपने घरों में लगा लिए, पर्यावरण में कोई सुधार हुआ या नहीं, हिमालय के लिए जो संकल्प लिया था उसमें कुछ कामयाबी मिली या नहीं, नदियों का पुनः जीवित करने के सपना पूरा हुआ या नहीं।

वास्तव में गंगा अभी मैली ही है लाख दावों के बाद अभी शायद बहुत कुछ नहीं बदला है चारों तरफ अभी कूड़े का ढेर दिखाई पड़ रहा हैं गंदगी की हालत ज्यों की त्यों है शीशम बाड़ा, कारगी प्लांट के इर्द गिर्द दुर्गंध से दम घुटता है सांस लेना मुश्किल हो जाता हैं नदी नाले कूड़े कचरे से सारे साल अटे रहते है जो बरसात में कुदरती तौर से बारिश के बहाव से साफ होते हैं और यह सारा जमा कूड़ा कचरा गंगा यमुना जैसी नदियों में जाकर समा जाता हैं अब चाहे यह कूड़ा कचरा हो, कंक्रीट का मलबा हो, नालियों की कीचड़ हो या सीवर का सॉलिड वेस्ट हो, सब बहकर वही पहुंच रहा है अब सरकार नदियों को पुनः जीवित करने के लिए बिंदाल रिस्पना पर यातायात को सुचारू बनाने के लिए एलिवेटेड रोड बनाकर इन दोनों नदियों के 26 किलोमीटर हिस्से को एक कवर्ड ड्रेन बनाने की एक नई पहल का आगाज करने जा रही हैं जिसके लिए 6200 करोड़ भी खर्च किए जाएंगे और नदियों के किनारे आने वाले 2600 से ज्यादा घर भी तोड़े जाएंगे। देहरादून नगर की पर्यावरण मुक्ति के लिए, यातायात सुचारू होने के 26 किलोमीटर ट्यूब ड्रेन से दोनों नदियों पुनः जीवित और प्रदूषण मुक्त हो जाएगी जैसे हर साल हरेला पर लाखों पौधे लगाने से उत्तराखंड में खास कर देहरादून में हरियाली ही हरियाली नजर आती हैं और सरकार को परियोजनाओं के लिए हज़ारों पेड़ काटने का जवाज़ मिल जाता हैं।

शायद इन सब बातों के ऊपर संजीदगी से विचार करने की जरूरत है कि नियंत्रित विकास के लिए हमारी कितनी योजनाएं सफल हैं या वह हमारी नस्लों के लिए परेशानियों का बाइस बन रही हैं। गांवों की अलावा शहर में योजना के विपरीत अवैध निर्माण जारी हैं और खूब हो रहे हैं सड़के कम होती जा रही हैं मगर यातायात पूरे शबाब पर हैं। इस बढ़ती हुए असुलंतन की स्थिति पर ईमानदारी से काम करने की जरूरत है ताकि आने वाले समय में स्थिति सुधरे। शायद अब देहरादून जैसे शहरों में ज्यादा बिगाड़ की गुंजाइश नहीं है वरना भयावह स्थिति को सुधारना मुश्किल होगा क्योंकि असंतुलित विकास से विस्फोटक स्थिति ही उत्पन्न होती हैं।

खुर्शीद अहमद सिद्दीकी, 37, प्रीति एनक्लेव, माजरा देहरादून।

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