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बीजेपी जीत रही, लेकिन क्या भारत की अर्थव्यवस्था हार रही है?

मजबूत राजनीतिक पकड़ के बीच आर्थिक मोर्चे पर उठते सवाल

Columnist: Er. Syed Farhan Ahmad Alig

देश में एक ओर भारतीय जनता पार्टी लगातार चुनावी सफलताएं हासिल कर रही है, वहीं दूसरी ओर अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। यह सवाल किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े रह चुके जाने-माने अर्थशास्त्री Surjit Bhalla ने उठाए हैं।

अपने एक लेख में सुरजीत भल्ला ने साफ शब्दों में कहा कि “बीजेपी चुनाव जीत रही है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था हार रही है।” उनके अनुसार, लगातार चुनावी जीत ने सरकार को राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत बना दिया है, लेकिन आर्थिक सुधारों की दिशा में अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं दे रही।

भल्ला का मानना है कि कमजोर विपक्ष के कारण सरकार पर आर्थिक जवाबदेही का दबाव कम हो गया है। निजी निवेश (Private Investment) और विदेशी निवेश (FDI) में गिरावट के संकेत सामने आ रहे हैं, फिर भी बड़े और कठिन आर्थिक सुधारों की दिशा में ठोस कदम नजर नहीं आते।

उन्होंने विशेष रूप से 2015 में बदले गए BIT (Bilateral Investment Treaty) नियमों पर चिंता जताई। इन नियमों के तहत विदेशी निवेशकों को किसी विवाद की स्थिति में भारतीय अदालतों का सहारा लेना पड़ता है और भारत से बाहर निकलने से पहले लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। भल्ला के अनुसार, इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा प्रभावित हुआ है और भारत, वियतनाम तथा मेक्सिको जैसे देशों की तुलना में कम आकर्षक निवेश गंतव्य बनता जा रहा है।

अर्थशास्त्री ने यह भी कहा कि सरकार अर्थव्यवस्था के “असल इलाज” की बजाय अस्थायी उपायों पर ज्यादा जोर दे रही है। केवल भावनात्मक अपीलों से निवेश नहीं आता, बल्कि निवेशक स्थिर नीतियों, भरोसेमंद व्यवस्था और बेहतर रिटर्न को देखते हैं।

आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक सफलता आर्थिक मजबूती की गारंटी बन पा रही है? बेरोजगारी, महंगाई, निवेश में कमी और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। ऐसे में सरकार के लिए केवल चुनाव जीतना ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार देना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है।

भारत जैसे विशाल देश की असली ताकत केवल राजनीतिक विजय नहीं, बल्कि मजबूत अर्थव्यवस्था, रोजगार के अवसर और निवेशकों का भरोसा है। अगर आर्थिक सुधारों की गति धीमी रही, तो आने वाले वर्षों में इसका असर आम जनता से लेकर उद्योग जगत तक हर स्तर पर दिखाई दे सकता है।

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