हमीरपुर जनपद के विकासखंड सुमेरपुर की ग्राम पंचायत बिदोखर का ऐतिहासिक राहुल देव मंदिर आज भी क्षत्रिय समाज की गौरवगाथा का प्रतीक बना हुआ है। विजयदशमी के अगले दिन यहां परंपरागत विजय उत्सव आयोजित होता है, जिसमें ‘बावनी बैस क्षत्रिय’ बड़ी संख्या में जुटते हैं। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है, जिसकी जड़ें उन्नाव के डौंडिया खेर से जुड़ी हुई हैं।
दशहरा जहां भगवान राम की रावण पर विजय का प्रतीक माना जाता है, वहीं बिदोखर में यह पर्व अन्याय पर न्याय की जीत की एक अलग कहानी से भी जुड़ा हुआ है।
स्थानीय बुज़ुर्ग अमर सिंह, दिनेश सिंह, रणविजय सिंह एडवोकेट और राधेश्याम सिंह पूर्व प्रधान बताते हैं कि 16-17वीं सदी में डौंडिया खेर (उन्नाव) के रहने वाले क्षत्रिय व्यापारी आसपास के जिलों में व्यापार करने जाया करते थे। इन्हीं में से एक थे राहुल देव सिंह, जो अपने भाई सतरूप सिंह के साथ गुड़ और चावल का व्यापार करने निकले थे।
कहा जाता है कि भीषण गर्मी में यात्रा के दौरान जब वे बिदोखर पहुंचे तो प्यास बुझाने के लिए गांव के बाहर बने कुएं पर गए। उस समय कुछ बगरी ठाकुर युवक वहां स्नान कर रहे थे। पानी मांगने पर उन्हें अपमानित करने की नीयत से जूते में पानी पीने को दिया गया। अपमान स्वीकार न करने पर दोनों भाइयों पर हमला कर दिया गया। इस संघर्ष में राहुल देव सिंह की हत्या कर दी गई जबकि सतरूप सिंह घायल अवस्था में बचकर छानी गांव पहुंचे और साथियों को घटना बताई।
इस घटना ने बैस क्षत्रियों को गहरा झटका दिया। उन्होंने प्रतिशोध लेने की कसम खाई और गुप्तचर भेजकर विरोधी पक्ष की गतिविधियों की जानकारी जुटाई। खबर मिली कि दशहरे की रात बगरी ठाकुर बड़े उत्सव में व्यस्त रहते हैं। उसी रात बैस क्षत्रियों ने हमला कर भीषण युद्ध किया और बड़ी संख्या में विरोधी मारे गए। इसके बाद बैस क्षत्रियों ने यहां अपना डेरा जमा लिया और समय के साथ 52 गांवों में बस गए। इन्हीं को आज ‘बावनी बैस क्षत्रिय’ कहा जाता है।
तब से लेकर आज तक दशहरे के दूसरे दिन बिदोखर में क्षत्रिय समाज राहुल देव सिंह की स्मृति में जुटकर विजय का पर्व मनाता है। यहां ब्राह्मणों को दक्षिणा देने और परंपरागत पूजा-पाठ करने की रस्म आज भी निभाई जाती है।
रिपोर्ट:- दीपक यादव






