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जनजातीय किसानों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु कृषि में उद्यमिता बहुत जरूरी: डॉ. प्रताप सिंह

झालावाड़ से ब्यूरो चीफ आसिफ शेरवानी की रिपोर्ट

विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर कृषि विज्ञान केन्द्र, झालावाड़ द्वारा कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कृषि विश्वविद्यालय कोटा के निदेशक प्रसार शिक्षा, डॉ. प्रताप सिंह ने की। मुख्य अतिथि पद्मश्री हुकमचंद पाटीदार तथा विशिष्ट अतिथि निदेशक शिक्षा डॉ. आई.बी. मौर्य रहे। वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. महेश चौधरी ने सभी अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया एवं कार्यक्रम की रूपरेखा से अवगत करवाया। निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि भारत आज विश्व का एक प्रमुख खाद्य उत्पादक देश है फिर भी देश में खाद्य पदार्थों की समान वितरण, पोषण विविधता और भंडारण-प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी के कारण खाद्य सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। देश के किसान वास्तव में अन्नदाता हैं उनके परिश्रम से ही यह धरती हरी-भरी है और हमारी थाली में अन्न है। डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि आज का समय कृषि में उद्यमिता का है, जहाँ किसान केवल उत्पादक नहीं बल्कि एक एग्रो-प्रेन्योर बन सकते हैं। उन्होंने उपस्थित किसानों से आग्रह किया कि वे मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन की दिशा में भी आगे बढ़ें ताकि उनकी आय में वास्तविक वृद्धि हो सके।

कृषि विश्वविद्यालय कोटा के निदेशक शिक्षा डॉ. आई. बी. मौर्य ने बताया कि कृषि क्षेत्र को अब मात्र उत्पादन से आगे बढ़कर पोषण केंद्रित कृषि की दिशा में बढ़ना होगा। अनाज के साथ-साथ फल, सब्जियाँ, कंद-मूल एवं पौष्टिक बागवानी फसलों का समावेश कर ही हर परिवार को संतुलित एवं विविध आहार उपलब्ध कराया जा सकता है। डॉ. मौर्य ने आगे कहा कि जनजातीय क्षेत्र में बागवानी, संरक्षित खेती और उच्च तकनीकी उद्यानिकी के माध्यम से किसानों की आमदनी में कई गुना वृद्धि की जा सकती है।

पद्मश्री हुकमचंद पाटीदार ने कहा कि रासायनिक खेती से भूमि, जल और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा और प्राकृतिक खेती को अपनाना होगा उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय किसान प्राकृतिक खेती से न केवल अपनी मिट्टी की उर्वरता बढ़ा सकते हैं बल्कि रसायन मुक्त अन्न उत्पादन कर मानव स्वास्थ्य की रक्षा भी कर सकते हैं।

डॉ. महेश चौधरी ने बताया कि केन्द्र द्वारा जनजातीय उपयोजना (टीएसपी) के तहत किसानों के समग्र विकास और आजीविका सशक्तिकरण हेतु विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य किसानों को आत्मनिर्भर बनाना और कृषि आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देना है। इसके अंतर्गत बकरी पालन, कुक्कुट पालन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, सब्जी उत्पादन, उन्नत बीज, और नवीन कृषि तकनीकों की जानकारी दी जा रही है।

कीट वैज्ञानिक डॉ. टी. सी. वर्मा ने बताया कि विश्व खाद्य दिवस हमें हर वर्ष यह स्मरण कराता है कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा और स्वास्थ्य का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर जैविक उपायों को अपनाकर किसान उत्पादन लागत कम कर सकते हैं और पर्यावरण की रक्षा भी कर सकते हैं।

प्रसार वैज्ञानिक डॉ. मौहम्मद युनुस ने कृषकों को फसल विविधीकरण, दालें एवं बागवानी फसलों का समावेश करने, पोषण वाटिका की स्थापना, प्राकृतिक एवं जैविक खेती पद्धतियों से सुरक्षित एवं पोषक भोजन का उत्पादन के साथ ही बूंद-बूंद सिंचाई ड्रिप एवं वर्षा जल संचयन का प्रयोग करने की सलाह दी।

कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञ-बागवानी डॉ. योगेंद्र कुमार मीना ने बागवानी फसलों व सब्जियां की महत्ता बताते किसानों को पोषण वाटिका स्थापित करने का सुझाव दिया।

आकाशवाणी झालावाड़ के अधिकारी बालमुकुंद सुमन, हरीओम मीना ने भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में जनजातीय क्षेत्रों के 250 से अधिक कृषकों ने भाग लिया । इस दौरान महिला कृषकों को गृह वाटिका स्थापित करने हेतु सब्जियों की किट भी उपलब्ध करवाये गए। कार्यक्रम के अंत में किसानों के साथ खुला संवाद सत्र रखा गया जिसमें किसानों ने अपनी समस्याएँ रखीं और विशेषज्ञों से समाधान प्राप्त किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मौहम्मद युनुस द्वारा किया गया तथा वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. महेश चौधरी ने सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों, मीडिया प्रतिनिधियों और किसानों का आभार व्यक्त किया।

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