आजकल यह चर्चा की जा रही है कि “वंदे मातरम्” के छह छंदों को सरकारी एवं सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाया जाएगा। इस संदर्भ में सबसे पहले यह आवश्यक है कि किसी भी कानूनी दावे की पुष्टि आधिकारिक सरकारी अधिसूचना या प्रामाणिक स्रोत से कर ली जाए। किसी अपुष्ट सूचना के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
जहाँ तक “वंदे मातरम्” के छह छंदों का संबंध है, उनका शब्दार्थ जानना आवश्यक है, ताकि हर व्यक्ति समझ-बूझ के साथ अपनी राय बना सके। पहले दो छंद मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्धि और महिमा का वर्णन करते हैं, जबकि आगे के छंदों में मातृभूमि को विद्या, धर्म, शक्ति, भक्ति तथा दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी-स्वरूपों के रूप में संबोधित किया गया है।
वंदे मातरम् के छह छंद जोकि राष्ट्रगान से पहले किसी भी सरकारी/सार्वजनिक प्रोग्राम्स से पहले अवश्य रूप से गया जाएगा और इसके सम्मान के लिए 1971 के बने कानून में राष्ट्रगान के साथ साथ अब राष्ट्र गीत को भी जोड़ दिया गया है और उक्त कानून की धाराओं को संशोधित कर दिया गया है। इसलिए राष्ट्रगीत के इन छह छंद का शब्दार्थ समझना आवश्यक हैं।
छंद प्रथम
मैं मातृभूमि की वंदना (सम्मान/पूजा) करता हूँ। जो उत्तम जल से संपन्न है, श्रेष्ठ फलों से भरपूर है, चंदन की सुगंध वाली शीतल हवाओं से युक्त है, हरी-भरी लहलहाती फसलों वाली है, उस मातृभूमि की मैं वंदना (सम्मान/पूजा) करता हूँ।
छंद द्वितीय
जिसकी रातें उजली चाँदनी से आलोकित हैं, जो खिले हुए फूलों और वृक्षों के पत्तों से सुशोभित है, जो मधुर मुस्कान वाली है, जो अत्यंत मधुर वाणी बोलने वाली है, जो सुख देने वाली और वरदान प्रदान करने वाली है, उस मातृभूमि की मैं वंदना (सम्मान/पूजा) करता हूँ।
छंद तृतीय
सात करोड़ कंठों की गूँजती हुई आवाज़ों वाली, चौदह करोड़ शक्तिशाली भुजाओं वाली, हे माँ! कौन कहता है कि तुम निर्बल हो? मैं उस माँ को नमन करता हूँ, जो अपार शक्ति धारण करने वाली है, जो तारने (उद्धार करने) वाली है, जो शत्रुओं के दल का विनाश करने वाली है, उस मातृभूमि की मैं वंदना (सम्मान/पूजा) करता हूँ।
छंद चतुर्थ
तुम ही विद्या हो, तुम ही धर्म हो, तुम ही हृदय में निवास करती हो, तुम ही हृदय का मर्म हो, तुम ही शरीर के प्राण हो, हे माँ! तुम ही भुजाओं की शक्ति हो, और तुम ही हृदय की भक्ति हो।
छंद पंचम
तुम ही दस आयुध धारण करने वाली दुर्गा हो, तुम ही कमल पर विराजमान लक्ष्मी (कमला) हो, तुम ही विद्या प्रदान करने वाली वाणी (सरस्वती) हो, मैं तुम्हें नमन करता हूँ।
छंद षष्ठ
मैं उस पवित्र, निष्कलंक, अतुलनीय, कमल के समान मातृभूमि को नमन करता हूँ, जो उत्तम जल और श्रेष्ठ फलों से संपन्न है। मैं मातृभूमि की वंदना करता हूँ।
मुस्लिम सियासी कार्यकर्ता व पदाधिकारी यह दलील देते हैं कि यह राष्ट्रप्रेम का गीत है और उनको इस गाने और मानने में कोई एतराज नहीं हैं। उनको यह छह छंदों का अर्थ समझकर अपनी बात का मुहासबा करना चाहिए। कि उनके लिए सियासी लाभ और आख़िरत का लाभ कौनसी बात अहम है।
दूसरी और जो अपने ईमान की हिफाज़त करना चाहते हैं उनको अक़ीदा तौहीद में किसी दूसरे अकीदे को शामिल करने की इजाजत नहीं है और यही आख़िरत की फलाह का जरिया है।
इन हालात में स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों/सियासी व्यक्तियों को यह बात जाननी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने आपके बोलने और खामोश रहने के दोनों अधिकारों को माना है। बच्चों की इस सिलसिले में कानूनी और मजहबी काउंसलिंग करना अति आवश्यक हैं ताकि वह अवसाद के शिकार न हो जाएं।
इसके अलावा अगर चूक हो जाती है तो तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला हुआ है। अल्लाह ताला हम सब की और खास कर नई नस्लों की इस से हिफाज़त फरमाए।
खुर्शीद अहमद सिद्दीकी,
कुछ मुस्लिम सियासी कार्यकर्ता और पदाधिकारी यह कहते हैं कि “वंदे मातरम्” केवल राष्ट्रप्रेम का गीत है और उन्हें इसे गाने में कोई आपत्ति नहीं है। ऐसे सभी लोगों के लिए आवश्यक है कि वे पूरे गीत के सभी छह छंदों के अर्थ को समझें और उसके बाद अपने दीन, अपने अक़ीदे और अपनी ज़िम्मेदारी के अनुसार गंभीरता से विचार करें कि उनके लिए सियासी लाभ अधिक महत्वपूर्ण है या आख़िरत की कामयाबी।
दूसरी ओर, जो मुसलमान अपने ईमान और अक़ीदा-ए-तौहीद की हिफाज़त करना चाहते हैं, उनके लिए यह उसूल हमेशा सामने रहना चाहिए कि इबादत, ताज़ीम और अक़ीदे के मामलों में अल्लाह तआला के साथ किसी दूसरे को शरीक नहीं किया जा सकता। आख़िरत की सफलता का रास्ता तौहीद पर मजबूती से क़ायम रहने में है।
इन परिस्थितियों में स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों तथा सामाजिक और सियासी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह भी जानना आवश्यक है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता के अनुसार आचरण करने का अधिकार देता है। न्यायालयों ने भी विभिन्न मामलों में यह माना है कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। इसलिए यदि किसी विद्यार्थी या व्यक्ति के मन में इस विषय को लेकर धार्मिक या कानूनी प्रश्न हों, तो उन्हें योग्य धार्मिक विद्वानों और विधि-विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए, ताकि वे मानसिक तनाव या भ्रम का शिकार न हों।
यदि किसी से अनजाने में कोई भूल हो जाए, तो अल्लाह तआला की रहमत बहुत व्यापक है। सच्चे दिल से तौबा करने वालों के लिए उसका दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है।
अल्लाह तआला हम सबको सही समझ, दृढ़ ईमान और हिकमत के साथ अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए तथा हमारी नई नस्लों की हर तरह के फ़ित्नों और गुमराही से हिफाज़त फ़रमाए। आमीन।
खुर्शीद अहमद सिद्दीकी





