नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता से जुड़े बयान पर भारत में सियासी बहस तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं ने भागवत के न्यूयॉर्क में दिए संदेश को लेकर सवाल उठाए हैं और कहा है कि देश के भीतर भी इन्हीं विचारों को व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
दरअसल, न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने भारत की विविधता और सामाजिक एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों के बावजूद भारत में लोगों के बीच एकता और साथ रहने की भावना देश की पहचान का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति भारत में मुसलमानों के नहीं रहने की इच्छा रखता है, वह हिंदू विचारधारा की मूल भावना को नहीं समझता।
भागवत के इस बयान के बाद विपक्षी नेताओं ने उनकी विदेश यात्रा के दौरान कही गई बातों और भारत में उनके सार्वजनिक रुख को लेकर सवाल खड़े किए। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि केवल बयान देने से बात पूरी नहीं होती, बल्कि उसके अनुरूप काम भी दिखाई देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि विदेश में विविधता और एकता की बात कही जा रही है, तो देश में भी उसी सोच का असर नजर आना चाहिए।
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भी भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि विदेश में इस तरह की बातें उनकी छवि को बेहतर बनाने की कोशिश का हिस्सा हैं। वहीं, TMC सांसद सौगत रॉय समेत कुछ अन्य नेताओं ने भी भागवत के संदेश को लेकर सवाल उठाए।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने हालांकि कहा कि भागवत का संदेश सकारात्मक है, लेकिन इसकी वास्तविक अहमियत तभी होगी जब ऐसी बातों को भारत में भी जमीन पर लागू किया जाए।
अब भागवत के अमेरिकी भाषण के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। एक तरफ उनके बयान को सामाजिक समरसता और धार्मिक सद्भाव का संदेश बताया जा रहा है, वहीं विपक्ष इसे देश के भीतर के राजनीतिक और सामाजिक रुख से जोड़कर सवाल उठा रहा है।






