सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के अकोला में 2023 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के दौरान हुई हत्या के मामले में पुलिस की भारी लापरवाही पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब कोई पुलिस अधिकारी वर्दी पहनता है, तो उसे अपनी व्यक्तिगत, धार्मिक या जातीय विचारधाराओं को पूरी तरह से छोड़कर केवल कानून और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार रहना चाहिए।
क्या है मामला?
मई 2023 में अकोला के पुराने शहर इलाके में पैगंबर मोहम्मद से जुड़े एक सोशल मीडिया पोस्ट के वायरल होने के बाद साम्प्रदायिक हिंसा भड़की। इस हिंसा में विलास महादेव राव गायकवाड़ की हत्या हुई और आठ लोग घायल हुए। घायलों में से एक मोहम्मद अफजल मोहम्मद शरीफ ने पुलिस पर आरोप लगाया कि हमलावरों ने उस पर भी बर्बर हमला किया और गंभीर रूप से घायल किया।
शरीफ ने अस्पताल में अपना बयान पुलिस को दिया था, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। जब उन्होंने अपने पिता के जरिए बॉम्बे हाईकोर्ट में शिकायत की, तो हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। कोर्ट ने इस बात को संदिग्ध बताया कि शरीफ का बयान पर्याप्त सबूत नहीं है। पुलिस का कहना था कि जांच के दौरान शरीफ का प्रत्यक्षदर्शी होना साबित नहीं हो पाया क्योंकि वह जांच के वक्त बात करने की स्थिति में नहीं था।
हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि पुलिस की यह लापरवाही और कर्तव्य के प्रति अनदेखी निंदनीय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस को बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष और जिम्मेदाराना तरीके से अपनी ड्यूटी निभानी चाहिए। कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को फटकार लगाई और कहा कि एफआईआर दर्ज न करना उनकी जिम्मेदारी में गंभीर चूक है।
यह कदम न्याय के प्रति सुप्रीम कोर्ट की सख्त प्रतिबद्धता को दर्शाता है और पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। अब एसआईटी इस मामले की पूरी जांच करेगी ताकि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सके।






