वकील राकेश किशोर ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की घटना को लेकर कहा कि उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है, क्योंकि वे बेहद आहत थे। उनका कहना है कि जब भी सनातन धर्म से जुड़ी कोई याचिका सुप्रीम कोर्ट में जाती है, तो उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता, बल्कि उसका मजाक उड़ाया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक मामले की सुनवाई के दौरान CJI ने मूर्ति पूजा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। राकेश किशोर का मानना है कि न्यायपालिका जैसे संवैधानिक संस्थानों में बैठे लोगों को अपनी भाषा और संवेदनशीलता का खास ध्यान रखना चाहिए।
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जातिगत आलोचनाओं पर उन्होंने कहा कि लोग उन्हें सीजेआई पर हमले को दलित-विरोधी रंग दे रहे हैं, जबकि उनकी मंशा ऐसा कुछ नहीं था। उन्होंने सवाल किया कि क्या कोई उनकी जाति जानता है — हो सकता है वे भी दलित हों। साथ ही उन्होंने कहा कि बी.आर. गवई अब बौद्ध धर्म अपना चुके हैं, तो केवल दलित पहचान को सामने लाना सही नहीं है। उनका कहना है कि यह कोई सोची-समझी साजिश नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक प्रतिक्रिया थी, और अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह ‘ऊपर वाले’ की मर्जी से हुआ। वे माफी मांगने को तैयार नहीं हैं, और अपने कदम को सही ठहराते हैं।






