अशोक कुमार श्रीवास की खास रिपोर्ट
13 साल पुराने भवन की छत से टपक रहा पानी, दीवारों का प्लास्टर उखड़ा; तिरपाल के सहारे चल रही कक्षाएं, ग्रामीणों ने तत्काल निरीक्षण और वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की
(कोरबा)/कोरबा विकासखंड के ग्राम पंचायत कुदुरमाल में संचालित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कुदुरमाल इन दिनों बदहाल शैक्षणिक व्यवस्था और भवन की जर्जर स्थिति के कारण चर्चा में है। करीब 13 वर्ष पुराने इस विद्यालय भवन की हालत लगातार खराब होती जा रही है। बारिश के मौसम में समस्या और गंभीर हो गई है। स्कूल की छत से जगह-जगह पानी टपक रहा है, दीवारों का प्लास्टर उखड़ रहा है और भवन के कई हिस्से बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा कर रहे हैं।
इस विद्यालय में कुदुरमाल सहित आसपास की करीब 10 ग्राम पंचायतों के लगभग 350 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में विद्यार्थी यहां पढ़ने पहुंचते हैं। ऐसे में यदि भवन की स्थिति वास्तव में असुरक्षित है, तो यह केवल भवन की मरम्मत का मामला नहीं, बल्कि सैकड़ों बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
बाहर बारिश, अंदर भी टपक रहा पानी
बारिश शुरू होते ही स्कूल भवन की वास्तविक स्थिति सामने आ जाती है। छत से पानी रिसने के कारण कई कक्षाओं के अंदर भी पानी टपकता है। इससे विद्यार्थियों को पढ़ाई करने में परेशानी होती है। किताबें, कॉपियां और अन्य शैक्षणिक सामग्री भी खराब होने का खतरा बना रहता है।
पानी से बचाव के लिए कुछ स्थानों पर तिरपाल का सहारा लिया जा रहा है। जर्जर छत के हिस्सों को भी तिरपाल से ढककर किसी तरह कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि तिरपाल जैसी अस्थायी व्यवस्था आखिर कब तक बच्चों को सुरक्षित रख पाएगी?
लगातार बारिश और भवन में बनी रहने वाली नमी से छत और दीवारों की स्थिति और खराब होने की आशंका बनी हुई है। यदि समय रहते आवश्यक मरम्मत नहीं की गई तो आने वाले दिनों में समस्या और गंभीर हो सकती है।
13 साल में ही जर्जर हो गया भवन
स्कूल भवन की उम्र करीब 13 वर्ष बताई जा रही है। इतनी कम अवधि में भवन की छत से पानी रिसना, प्लास्टर उखड़ना और कई हिस्सों का खराब होना भवन निर्माण की गुणवत्ता और रखरखाव पर सवाल खड़े करता है।
दीवारों पर जगह-जगह प्लास्टर उखड़ चुका है। कई हिस्सों में भवन पुराना और कमजोर नजर आता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि संबंधित विभाग भवन की स्थिति का केवल कागजी आकलन करने के बजाय मौके पर पहुंचकर तकनीकी एवं भौतिक निरीक्षण कराए।
यदि जांच में भवन को सुरक्षित पाया जाता है तो जिन हिस्सों में मरम्मत की जरूरत है, वहां तत्काल सुधार कार्य कराया जाना चाहिए। वहीं यदि भवन का कोई हिस्सा बच्चों के लिए असुरक्षित है, तो वहां कक्षाएं संचालित करना तत्काल रोका जाना चाहिए।
350 बच्चों की सुरक्षा पर सवाल
इस विद्यालय में पढ़ने वाले करीब 350 विद्यार्थी अलग-अलग ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनके लिए यही विद्यालय आसपास के क्षेत्र में उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का प्रमुख केंद्र है।
अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल भेजते हैं, लेकिन यदि उन्हें हर बारिश में छत से पानी टपकने, प्लास्टर गिरने या भवन के कमजोर हिस्सों की चिंता बनी रहे तो यह स्वाभाविक रूप से गंभीर स्थिति है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी दिन छत का कोई हिस्सा या दीवार का प्लास्टर अचानक गिर गया और कोई विद्यार्थी इसकी चपेट में आ गया तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
हादसा होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय प्रशासन को उससे पहले खतरे को पहचानकर कदम उठाना होगा।
पढ़ाई के साथ सुरक्षा भी जरूरी
विद्यालय का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा उपलब्ध कराना है। लेकिन बारिश के दौरान जब कक्षा के भीतर ही पानी टपकने लगे तो विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए पढ़ाई प्रभावित होती है।
कई बार बच्चे अपनी किताब-कॉपियों को पानी से बचाने में लगे रहते हैं तो शिक्षकों को भी कक्षा संचालन में कठिनाई होती है। ऐसे माहौल में नियमित और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई प्रभावित होना स्वाभाविक है।
बारिश के मौसम में यदि किसी कमरे में लगातार पानी रिस रहा है तो वहां विद्युत व्यवस्था, फर्श और अन्य संसाधनों से जुड़े जोखिमों की भी जांच जरूरी है। इसलिए केवल छत पर तिरपाल डाल देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
विद्यालय भवन की स्थिति को लेकर अब शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।
क्या विभागीय अधिकारियों को भवन की जर्जर स्थिति की जानकारी है?
क्या संबंधित बीईओ और डीईओ कार्यालय के अधिकारियों ने विद्यालय का मौके पर निरीक्षण किया है?
क्या भवन की सुरक्षा को लेकर कोई तकनीकी जांच कराई गई है?
यदि भवन असुरक्षित है तो उसमें बच्चों की कक्षाएं क्यों संचालित की जा रही हैं?
यदि भवन सुरक्षित है तो छत से पानी रिसने और प्लास्टर उखड़ने जैसी समस्या क्यों बनी हुई है?
भवन के रखरखाव और मरम्मत के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए?
बारिश के दौरान पानी टपकने वाले कमरों के लिए वैकल्पिक कक्षों की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या प्रशासन किसी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है या उससे पहले सुरक्षा के उपाय किए जाएंगे?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग के अधिकारियों को देना चाहिए।
ग्रामीणों और शाला प्रबंधन समिति ने मांगी तत्काल कार्रवाई
विद्यालय की स्थिति को लेकर ग्रामीणों और शाला प्रबंधन समिति में भी चिंता है। उनका कहना है कि मामले को महज छोटी-मोटी मरम्मत तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। सबसे पहले भवन की मजबूती और सुरक्षा की जांच कराई जानी चाहिए।
ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित अधिकारी तत्काल विद्यालय पहुंचकर भवन का निरीक्षण करें। यदि किसी हिस्से को बच्चों के लिए असुरक्षित पाया जाता है तो वहां कक्षाएं संचालित न कराकर तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।
इसके साथ ही भवन की वास्तविक स्थिति के आधार पर आवश्यकतानुसार मरम्मत, जीर्णोद्धार अथवा नए भवन के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए।
बारिश में बढ़ जाता है खतरा
जर्जर भवनों के लिए बारिश का मौसम विशेष रूप से संवेदनशील माना जाता है। लगातार पानी रिसने से दीवारों और छत में नमी बढ़ती है। इससे पहले से कमजोर हिस्सों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
ऐसे में केवल आंखों से देखकर भवन को सुरक्षित मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। भवन की स्थिति का विशेषज्ञों अथवा तकनीकी विभाग से परीक्षण कराना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए भवन कितना सुरक्षित है।
यदि जांच में किसी हिस्से में गंभीर structural समस्या सामने आती है तो उस हिस्से को तत्काल खाली कराकर वैकल्पिक कक्ष की व्यवस्था करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
स्कूल भवन की हालत व्यवस्था पर बड़ा सवाल
कुदुरमाल का यह विद्यालय केवल एक भवन नहीं है। यह आसपास की करीब 10 ग्राम पंचायतों से आने वाले लगभग 350 बच्चों की शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र है। इन बच्चों का भविष्य सुरक्षित और बेहतर शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है।
एक तरफ शासन स्तर पर सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं देने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी तरफ यदि बच्चे बारिश के दौरान पानी टपकती छत के नीचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, तो यह जमीनी स्तर पर व्यवस्था की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
विद्यालय भवन की उम्र करीब 13 वर्ष होने के बावजूद यदि वह इतनी जल्दी जर्जर स्थिति में पहुंच गया है तो निर्माण की गुणवत्ता, समय-समय पर हुए रखरखाव और मरम्मत कार्यों की भी जांच की जरूरत है।
अब कार्रवाई का इंतजार
कुदुरमाल के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की स्थिति पर अब सभी की नजर शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की ओर है। ग्रामीणों और अभिभावकों को उम्मीद है कि अधिकारी मामले को गंभीरता से लेते हुए विद्यालय का तत्काल निरीक्षण करेंगे और बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे।
सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि भवन विद्यार्थियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। इसके बाद जरूरत के अनुसार मरम्मत, जीर्णोद्धार अथवा नए भवन की दिशा में ठोस निर्णय लिया जाना चाहिए।
बारिश के मौसम में किसी अप्रिय घटना की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन के लिए यह जरूरी है कि हादसा होने का इंतजार करने के बजाय उससे पहले सुरक्षा के कदम उठाए जाएं।
कुदुरमाल के बच्चों को ऐसी कक्षा चाहिए जहां वे बारिश से बचकर पढ़ सकें, न कि ऐसी छत के नीचे जहां हर बारिश के साथ खतरे की आशंका बनी रहे।
बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, सिर पर जर्जर छत का डर नहीं। अब जरूरत है कि प्रशासन इस मामले में निरीक्षण से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई करे।








