Home / Updates / मथुरा-वृंदावन में तबाही: यमुना का पानी घर-आंगन निगल रहा, लोग छतों पर जिंदगी बचाने को मजबूर…..

मथुरा-वृंदावन में तबाही: यमुना का पानी घर-आंगन निगल रहा, लोग छतों पर जिंदगी बचाने को मजबूर…..

मथुरा और वृंदावन इन दिनों बाढ़ की मार झेल रहे हैं। यमुना का पानी इतना बढ़ गया है कि गलियां, कॉलोनियां और गांव सब जलमग्न हो चुके हैं। जिन रास्तों पर रोज़ बच्चे खेलते थे, वहां अब तेज बहाव है। जिन घरों की चौखट पर कभी दीपक जले थे, वहां अब पानी लहरें मार रहा है।

“घर कैसे छोड़ दें…?”

तिवारीपुरम और आसपास के गांवों में हालात सबसे खराब हैं। कई लोग अब भी अपने घरों को छोड़ने को तैयार नहीं। श्याम कुटी कॉलोनी के मोहन की आंखों में डर साफ झलकता है—
“हमने ये घर खून-पसीने से बनाए हैं। अंदर ज़िंदगी भर की कमाई लगी है। अगर चले गए तो सामान चोरी हो जाएगा… फिर लौटकर आएंगे तो क्या बचेगा?”

जिनके घरों में पानी घुस चुका है, वे अब छतों पर टीन की छतरी और कुछ सामान के सहारे दिन-रात काट रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता है— पीने के पानी की। बिजली नहीं है, नलकूप नहीं चल रहे। लोग बारिश का पानी टंकियों और बाल्टियों में भरकर छानकर पीने को मजबूर हैं।

नाव बनी एकमात्र सहारा

जयसिंहपुरा और वृंदावन की कॉलोनियों में पांच फीट तक पानी भरा है। गलियों में अब गाड़ियां नहीं, बल्कि नावें चल रही हैं। गणेश धाम कॉलोनी के आबिद ने जितना हो सका, अपना सामान छत पर रख लिया था। परिवार वहीं रह रहा था। लेकिन जब पानी और बढ़ा तो बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए उन्हें घर छोड़ना पड़ा।
“छोड़ते वक्त लगा जैसे अपना सपना, अपना जीवन पीछे छोड़ रहे हों।” – आबिद की आंखें भर आईं।

मंदिर-श्मशान तक पानी, गायें संकट में

बलदेव के खडैरा घाट पर यमुना इतनी बढ़ी कि शिव मंदिर और श्मशान घाट डूब गए। गोशालाओं में पानी घुस गया, गायें बेचैन होकर चारों ओर भाग रही हैं। गांवों के लोग भी परेशान हैं— “श्मशान घाट डूब गया, अब अंतिम संस्कार भी कहां करें?”

अंधकार ने बढ़ाई मुश्किलें

जैसे इतना काफ़ी न हो, नौहझील क्षेत्र में 25 घंटे तक बिजली भी गुल रही। न रात को रोशनी, न दिन में पानी। छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज़्यादा परेशान हुए।
गांव की एक महिला ने कहा—
“पानी तो पहले ही जान ले रहा है, अब अंधेरे ने जीना और मुश्किल कर दिया।”

लोगों की अपील

स्थानीय लोग प्रशासन से लगातार मदद की गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ नावें और शेल्टर होम काफी नहीं हैं, बल्कि ज़रूरी है कि बिजली और पानी की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।

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