नई दिल्ली: पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। 18 सितंबर को दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान अंसारी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने कथन का हवाला देते हुए कहा था कि भारत के लिए खतरा साम्यवाद नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता थी। उन्होंने देश में नागरिक राष्ट्रवाद से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ते रुझानों को लेकर भी चिंता जताई।
अंसारी के इस बयान पर भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई और उनसे अपने शब्द वापस लेने की मांग की। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चर्चा में कट्टरपंथ और अलगाववाद के अन्य रूपों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी बयान से जताई असहमति
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि कुछ प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी अंसारी की टिप्पणी का समर्थन नहीं किया। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि हिंदू या मुस्लिम समाज के सभी लोगों को कट्टरपंथी बताना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, किसी छोटे समूह के व्यवहार के आधार पर पूरे समुदाय को लेकर टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए।
रशीदी ने अंसारी के संवैधानिक पद पर रहने के दौरान और पद छोड़ने के बाद दिए गए बयानों को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए अंसारी की ओर से मुसलमानों से जुड़े ऐसे बयान कम सुनने को मिले, जबकि पद से हटने के बाद इस तरह की टिप्पणियां सामने आई हैं।
उमर अहमद इलियासी ने भी की आलोचना
ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के मुख्य इमाम उमर अहमद इलियासी ने भी अंसारी के बयान पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह की बयानबाजी से समाज में तनाव बढ़ सकता है और मुसलमानों के नाम पर राजनीतिक चर्चा किए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि देश के मुसलमान ऐसे बयानों से सहमत नहीं हैं।
क्या था हामिद अंसारी का पूरा संदर्भ?
हामिद अंसारी ने अपने संबोधन में संविधान विशेषज्ञ और लेखक एजी नूरानी की पुस्तक The RSS: A Menace to India का संदर्भ दिया था। उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में दर्ज पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी एक टिप्पणी का उल्लेख किया। इसी टिप्पणी में दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को भारत के लिए एक खतरे के रूप में बताया गया था।
अंसारी ने इसके साथ ही धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकों के बीच अंतर पैदा होने और असहिष्णुता बढ़ने की आशंका जताई। उनके इसी बयान के बाद राजनीतिक दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हुआ।






